महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः
भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना
भीम उवाच
श्रोत्रियस्येव ते राजन् मन्दकस्याविपश्चितः ।
अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी ॥ १ ॥
**भीमसेन बोले—**राजन्! जैसे मन्द और अर्थज्ञानसे शून्य श्रोत्रियकी बुद्धि केवल मन्त्रपाठद्वारा मारी जाती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि भी तात्त्विक अर्थको देखने या समझनेवाली नहीं है ॥ १ ॥
आलस्ये कृतचित्तस्य राजधर्मानसूयतः ।
विनाशे धार्तराष्ट्राणां किं फलं भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! यदि राजधर्मकी निन्दा करते हुए आपने आलस्यपूर्ण जीवन बितानेका ही निश्चय किया था तो धृतराष्ट्रके पुत्रोंका विनाश करानेसे क्या फल मिला? ॥ २ ॥
क्षमानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं न विद्यते ।
क्षात्रमाचरतो मार्गमपि बन्धोस्त्वदन्तरे ॥ ३ ॥
क्षत्रियोचित मार्गपर चलनेवाले पुरुषके हृदयमें अपने भाईपर भी क्षमा, दया, करुणा और कोमलताका भाव नहीं रह जाता; फिर आपके हृदयमें यह सब क्यों है? ॥ ३ ॥
यदिमां भवतो बुद्धिं विद्याम वयमीदृशीम् ।
शस्त्रं नैव ग्रहीष्यामो न वधिष्याम कंचन ॥ ४ ॥
यदि हम पहले ही जान लेते कि आपका विचार इस तरहका है तो हम हथियार नहीं उठाते और न किसीका वध ही करते ॥ ४ ॥
भैक्ष्यमेवाचरिष्याम शरीरस्याविमोक्षणात् ।
न चेदं दारुणं युद्धमभविष्यन्महीक्षिताम् ॥ ५ ॥
हम भी आपकी ही तरह शरीर छूटनेतक भीख माँगकर ही जीवन-निर्वाह करते। फिर तो राजाओंमें यह भयंकर युद्ध होता ही नहीं ॥ ५ ॥
प्राणस्यान्नमिदं सर्वमिति वै कवयो विदुः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ ६ ॥
विद्वान् पुरुष कहते हैं कि यह सब कुछ प्राणका अन्न है, स्थावर और जङ्गम सारा जगत् प्राणका भोजन है ॥ ६ ॥
आददानस्य चेद् राज्यं ये केचित् परिपन्थिनः ।