महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहस्थाश्रमिणस्तच्च यज्ञकर्म विरोधकम् । तस्माद् गार्हस्थ्यमेवेह दुष्करं दुर्लभं तथा ॥ २२ ॥ वह यज्ञकर्म गृहस्थाश्रमी पुरुषको एक मर्यादाके भीतर बाँध रखनेवाला है; इसलिये गार्हस्थ्यधर्म ही इस संसारमें दुष्कर और दुर्लभ है ॥ २२ ॥ तत् सम्प्राप्य गृहस्था ये पशुधान्यधनान्विताः । न यजन्ते महाराज शाश्वतं तेषु किल्बिषम् ॥ २३ ॥ महाराज! जो गृहस्थ उसे पाकर पशु और धन-धान्यसे सम्पन्न होते हुए भी यज्ञ नहीं करते हैं, उन्हें सदा ही पापका भागी होना पड़ता है ॥ २३ ॥ स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथा परे । अथापरे महायज्ञान् मनस्येव वितन्वते ॥ २४ ॥ कुछ ऋषि वेद-शास्त्रोंका स्वाध्यायरूप यज्ञ करनेवाले होते हैं, कुछ ज्ञानयज्ञमें तत्पर रहते हैं और कुछ लोग मनमें ही ध्यानरूपी महान् यज्ञोंका विस्तार करते हैं ॥ २४ ॥ एवं मनःसमाधानं मार्गमातिष्ठतो नृप । द्विजातेर्ब्रह्मभूतस्य स्पृहयन्ति दिवौकसः ॥ २५ ॥ नरेश्वर! चित्तको एकाग्र करना-रूप जो साधन है उसका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत हुए द्विजके दर्शनकी अभिलाषा देवता भी रखते हैं ॥ २५ ॥ स रत्नानि विचित्राणि संहृतानि ततस्ततः । मखेष्वनभिसंत्यज्य नास्तिक्यमभिजल्पसि ॥ २६ ॥ इधर-उधरसे जो विचित्र रत्न संग्रह करके लाये गये हैं, उनका यज्ञोंमें वितरण न करके आप नास्तिकताकी बातें कर रहे हैं ॥ २६ ॥ कुटुम्बमास्थिते त्यागं न पश्यामि नराधिप । राजसूयाश्वमेधेषु सर्वमेधेषु वा पुनः ॥ २७ ॥ नरेश्वर! जिसपर कुटुम्बका भार हो, उसके लिये त्यागका विधान नहीं देखनेमें आता है। उसे तो राजसूय, अश्वमेध अथवा सर्वमेध यज्ञोंमें प्रवृत्त होना चाहिये ॥ २७ ॥ ये चान्ये क्रतवस्तात ब्राह्मणैरभिपूजिताः । तैर्यजस्व महीपाल शक्रो देवपतिर्यथा ॥ २८ ॥ भूपाल! इनके सिवा जो दूसरे भी ब्राह्मणोंद्वारा प्रशंसित यज्ञ हैं, उनके द्वारा देवराज इन्द्रके समान आप भी यज्ञपुरुषकी आराधना कीजिये ॥ २८ ॥ राज्ञः प्रमाददोषेण दस्युभिः परिमुष्यताम् । अशरण्यः प्रजानां यः स राजा कलिरुच्यते ॥ २९ ॥ राजाके प्रमाददोषसे लुटेरे प्रबल होकर प्रजाको लूटने लगते हैं, उस अवस्थामें यदि राजाने प्रजाको शरण नहीं दी तो उसे मूर्तिमान् कलियुग कहा जाता है ॥ २९ ॥ अश्वान् गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलंकृताः ।