महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रामाञ्जनपदांश्चैव क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥ ३० ॥ अप्रदाय द्विजातिभ्यो मात्सर्याविष्टचेतसः । वयं ते राजकलयो भविष्याम विशाम्पते ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! यदि हमलोग ईर्ष्यायुक्त मनवाले होकर ब्राह्मणोंको घोड़े, गाय, दासी, सजी-सजायी हथिनी, गाँव, जनपद, खेत और घर आदिका दान नहीं करते हैं तो राजाओंमें कलियुग समझे जायँगे ॥ ३०-३१ ॥
अदातारः शरण्याश्च राजकिल्बिषभागिनः । दोषाणामेव भोक्तारो न सुखानां कदाचन ॥ ३२ ॥ जो दान नहीं देते, शरणागतोंकी रक्षा नहीं करते, वे राजाओंके पापके भागी होते हैं। उन्हें दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है, सुख तो कभी नहीं मिलता ॥ ३२ ॥
अनिष्ट्वा च महायज्ञैरकृत्वा च पितृस्वधाम् । तीर्थेष्वनभिसम्प्लुत्य प्रव्रजिष्यसि चेत् प्रभो ॥ ३३ ॥ छिन्नाभ्रमिव गन्तासि विलयं मारुतेरितम् । लोकयोरुभयोर्भ्रष्टो ह्यन्तराले व्यवस्थितः ॥ ३४ ॥ प्रभो! बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान, पितरोंका श्राद्ध तथा तीर्थोंमें स्नान किये बिना ही आप संन्यास ले लेंगे तो हवा-द्वारा छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान नष्ट हो जायँगे। लोक और परलोक दोनोंसे भ्रष्ट होकर (त्रिशंकुके समान) बीचमें ही लटके रह जायँगे ॥ ३३-३४ ॥
अन्तर्बहिश्च यत् किंचिन्मनोव्यासंगकारकम् । परित्यज्य भवेत् त्यागी न हित्वा प्रतितिष्ठति ॥ ३५ ॥ बाहर और भीतर जो कुछ भी मनको फँसानेवाली चीजें हैं, उन सबको छोड़नेसे मनुष्य त्यागी होता है। केवल घर छोड़ देनेसे त्यागकी सिद्धि नहीं होती ॥ ३५ ॥
एतस्मिन् वर्तमानस्य विधावप्रतिषेधिते । ब्राह्मणस्य महाराज नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥ ३६ ॥ महाराज! इस गृहस्थ-आश्रममें ही रहकर वेद-विहित कर्ममें लगे हुए ब्राह्मणका कभी उच्छेद (पतन) नहीं होता ॥ ३६ ॥
निहत्य शत्रूंस्तरसा समृद्धान् शक्रो यथा दैत्यबलानि संख्ये । कः पार्थ शोचेन्निरतः स्वधर्मे पूर्वैः स्मृते पार्थिव शिष्टजुष्टे ॥ ३७ ॥ कुन्तीनन्दन! जैसे इन्द्र युद्धमें दैत्योंकी सेनाओंका संहार करते हैं, उसी प्रकार जो वेगपूर्वक बढ़े-चढ़े शत्रुओंका वध करके विजय पा चुका हो और पूर्ववर्ती राजाओंद्वारा