भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 819, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 819

श्रुत्वा हि धृतराष्ट्रश्च दुर्योधनवचस्तदा ।
अब्रवीत् कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ॥ ७ ॥
उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनकी बात सुनकर कर्णसहित उससे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग् भविष्यति ॥ ८ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**बेटा! तुम किसलिये संतप्त हो रहे हो? यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ, सुनकर यदि उचित होगा तो तुम्हें समझानेका प्रयत्न करूँगा ॥ ८ ॥

त्वया च महदैश्वर्यं प्राप्तं परपुरञ्जय ।
किंकरा भ्रातरः सर्वे मित्रसम्बन्धिनः सदा ॥ ९ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वीर! तुमने भी तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया है? तुम्हारे समस्त भाई, मित्र और सम्बन्धी सदा तुम्हारी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥

आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् ।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥
तुम अच्छे-अच्छे वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, पिशितौदन खाते हो और 'आजानेय' अश्व (अरबी घोड़े) तुम्हारा रथ खींचते हैं, फिर तुम क्यों सफेद और दुबले हुए जाते हो? ॥ १० ॥

दुर्योधन उवाच

दश तानि सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ११ ॥
**दुर्योधनने कहा—**पिताजी! युधिष्ठिरके महलमें दस हजार महामनस्वी स्नातक ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् ।
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान् वस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥
दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिं वैश्रवणीं शुभाम् ।
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि भारत ॥ १३ ॥
भारत! दिव्य फल-फूलोंसे सुशोभित वह दिव्य सभा, वे तीतरके समान रंगवाले चितकबरे घोड़े और वे भाँति-भाँतिके दिव्य वस्त्र (अपने पास कहाँ हैं? वह सब) देखकर अपने शत्रु पाण्डवोंके उस कुबेरके समान शुभ एवं विशाल ऐश्वर्यका अवलोकन करके मैं निरन्तर शोकमें डूबा जा रहा हूँ ॥ १२-१३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच