भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 820

यदीच्छसि श्रियं तात यादृशी सा युधिष्ठिरे । विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान् भव पुत्रक ॥ १४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**तात! पुरुषसिंह! बेटा! युधिष्ठिरके पास जैसी सम्पत्ति है, वैसी या उससे भी बढ़कर राजलक्ष्मीको यदि तुम पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो ॥ १४ ॥ शीलेन हि त्रयो लोकाः शक्या जेतुं न संशयः । न हि किंचिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ॥ १५ ॥ इसमें संशय नहीं है कि शीलके द्वारा तीनों लोकोंपर विजय पायी जा सकती है। शीलवानोंके लिये संसारमें कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १५ ॥ एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजयः । सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिरे ॥ १६ ॥ मान्धाताने एक ही दिनमें, जनमेजयने तीन ही दिनोंमें और नाभागने सात दिनोंमें ही इस पृथिवीका राज्य प्राप्त किया था ॥ १६ ॥ एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दयान्विताः । अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वयमागता ॥ १७ ॥ ये सभी राजा शीलवान् और दयालु थे। अतः उनके द्वारा गुणोंके मोल खरीदी हुई यह पृथ्वी स्वयं ही उनके पास आयी थी ॥ १७ ॥

दुर्योधन उवाच

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत । येन शीलेन तैः प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा ॥ १८ ॥ **दुर्योधनने पूछा—**भारत! जिसके द्वारा उन राजाओंने शीघ्र ही भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लिया, वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदेन पुरा प्रोक्तं शीलमाश्रित्य भारत ॥ १९ ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**भरतनन्दन! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसे नारदजीने पहले शीलके प्रसंगमें कहा था ॥ १९ ॥ प्रह्लादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः । शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशे कृतम् ॥ २० ॥ दैत्यराज प्रह्लादने शीलका ही आश्रय लेकर महामना महेन्द्रका राज्य हर लिया और तीनों लोकोंको भी अपने वशमें कर लिया ॥ २० ॥ ततो बृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः । तमुवाच महाप्राज्ञः श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥