महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 821, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब महाबुद्धिमान् इन्द्र हाथ जोड़कर बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हुए और उनसे बोले—‘भगवन्! मैं अपने कल्याणका उपाय जानना चाहता हूँ’ ॥ २१ ॥
ततो बृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ।
कथयामास भगवान् देवेन्द्राय कुरूद्वह ॥ २२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब भगवान् बृहस्पतिने उन देवेन्द्रको कल्याणकारी परम ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २२ ॥
एतावच्छ्रेय इत्येव बृहस्पतिरभाषत ।
इन्द्रस्तु भूयः पप्रच्छ को विशेषो भवेदिति ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् इतना ही श्रेय (कल्याणका उपाय) है, ऐसा बृहस्पतिने कहा। तब इन्द्रने फिर पूछा—‘इससे विशेष वस्तु क्या है?’ ॥ २३ ॥
बृहस्पतिरुवाच
विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः ।
अत्रागमय भद्रं ते भूय एव सुरर्षभ ॥ २४ ॥
बृहस्पतिने कहा— तात! सुरश्रेष्ठ! इससे भी विशेष महत्त्वपूर्ण वस्तुका ज्ञान महात्मा शुक्राचार्यको है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन्हींके पास जाकर पुनः उस वस्तुका ज्ञान प्राप्त करो ॥ २४ ॥
आत्मनस्तु ततः श्रेयो भार्गवात् सुमहातपाः ।
ज्ञानमागमयत् प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ॥ २५ ॥
तब परम तेजस्वी महातपस्वी इन्द्रने प्रसन्नता-पूर्वक शुक्राचार्यसे पुनः अपने लिये श्रेयका ज्ञान प्राप्त किया ॥ २५ ॥
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना ।
श्रेयोऽस्तीति पुनर्भूयः शुक्रम्राह शतक्रतुः ॥ २६ ॥
महात्मा भार्गवने जब उन्हें उपदेश दे दिया, तब इन्द्रने पुनः शुक्राचार्यसे पूछा—‘क्या इससे भी विशेष श्रेय है’? ॥ २६ ॥
भार्गवस्त्वाह सर्वज्ञः प्रह्लादस्य महात्मनः ।
ज्ञानमस्ति विशेषेणेत्युक्तो हृष्टश्च सोऽभवत् ॥ २७ ॥
तब सर्वज्ञ शुक्राचार्यने कहा— ‘महात्मा प्रह्लादको इससे विशेष श्रेयका ज्ञान है।’ यह सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
स ततो ब्राह्मणो भूत्वा प्रह्लादं पाकशासनः ।
गत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रह्लादके पास गये और बोले—‘राजन्! मैं श्रेय जानना चाहता हूँ’ ॥ २८ ॥