भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 948

'मेरे प्राण शिथिल हो रहे हैं। क्षुधासे मेरी श्रवणशक्ति नष्ट होती जा रही है। मैं दुबला हो गया हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है; अतः अब मुझमें भक्ष्य और अभक्ष्यका विचार नहीं रह गया है ॥ ५२ ॥

सोऽधर्मं बुद्ध्यमानोऽपि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ।
अटन् भैक्ष्यं न विन्दामि यदा युष्माकमालये ॥ ५३ ॥
तदा बुद्धिः कृता पापे हरिष्यामि श्वजाघनीम् ।
'मैं जानता हूँ कि यह अधर्म है तो भी यह कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा। मैं तुमलोगोंके घरोंपर घूम-घूमकर माँगनेपर भी जब भीख नहीं पा सका हूँ, तब मैंने यह पापकर्म करनेका विचार किया है; अतः कुत्तेकी जाँघ ले जाऊँगा ॥ ५३ १/२ ॥

अग्निर्मुखं पुरोधाश्च देवानां शुचिषाड् विभुः ॥ ५४ ॥
यथावत् सर्वभूग् ब्रह्मा तथा मां विद्धि धर्मतः ।
'अग्निदेव देवताओंके मुख हैं, पुरोहित हैं, पवित्र द्रव्य ही ग्रहण करते हैं और महान् प्रभावशाली हैं तथापि वे जैसे अवस्थाके अनुसार सर्वभक्षी हो गये हैं, उसी प्रकार मैं ब्राह्मण होकर भी सर्वभक्षी बनूँगा; अतः तुम धर्मतः मुझे ब्राह्मण ही समझो' ॥ ५४ १/२ ॥

तमुवाच स चाण्डालो महर्षे शृणु मे वचः ॥ ५५ ॥
श्रुत्वा तत् त्वं तथाऽऽतिष्ठ यथा धर्मो न हीयते ।
तब चाण्डालने उनसे कहा—'महर्षे! मेरी बात सुनिये और उसे सुनकर ऐसा काम कीजिये, जिससे आपका धर्म नष्ट न हो ॥ ५५ १/२ ॥

धर्मं तवापि विप्रर्षे शृणु यत् ते ब्रवीम्यहम् ॥ ५६ ॥
शृगालादधमं श्वानं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
तस्याप्यधम उद्देशः शरीरस्य श्वजाघनी ॥ ५७ ॥
'ब्रह्मर्षे! मैं आपके लिये भी जो धर्मकी ही बात बता रहा हूँ, उसे सुनिये। मनीषी पुरुष कहते हैं कि कुत्ता सियारसे भी अधम होता है। कुत्तेके शरीरमें भी उसकी जाँघका भाग सबसे अधम होता है ॥ ५६-५७ ॥

नेदं सम्यग् व्यवसितं महर्षे धर्मगर्हितम् ।
चाण्डालस्वस्य हरणमभक्ष्यस्य विशेषतः ॥ ५८ ॥
'महर्षे! आपने जो निश्चय किया है, यह ठीक नहीं है, चाण्डालके धनका, उसमें भी विशेषरूपसे अभक्ष्य पदार्थका अपहरण धर्मकी दृष्टिसे अत्यन्त निन्दित है ॥ ५८ ॥

साध्वन्यमनुपश्य त्वमुपायं प्राणधारणे ।
न मांसलोभात् तपसो नाशस्ते स्यान्महामुने ॥ ५९ ॥
'महामुने! अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये कोई दूसरा अच्छा-सा उपाय सोचिये। मांसके लोभसे आपकी तपस्याका नाश नहीं होना चाहिये ॥ ५९ ॥

जानता विहितं धर्मं न कार्यो धर्मसंकरः ।

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