भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 949

मा स्म धर्मं परित्याक्षीस्त्वं हि धर्मभृतां वरः ।। ६० ।। ‘आप शास्त्रविहित धर्मको जानते हैं, अतः आपके द्वारा धर्मसंकरताका प्रचार नहीं होना चाहिये। धर्मका त्याग न कीजिये; क्योंकि आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ समझे जाते हैं’ ।। ६० ।।

विश्वामित्रस्ततो राजन्नित्युक्तो भरतर्षभ । क्षुधार्तः प्रत्युवाचेदं पुनरेव महामुनिः ।। ६१ ।। भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! चाण्डालके ऐसा कहनेपर क्षुधासे पीड़ित हुए महामुनि विश्वामित्रने उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ।। ६१ ।।

निराहारस्य सुमहान् मम कालोऽभिधावतः । न विद्यतेऽप्युपायश्च कश्चिन्मे प्राणधारणे ।। ६२ ।। ‘मैं भोजन न मिलनेके कारण उसकी प्राप्तिके लिये इधर-उधर दौड़ रहा हूँ। इसी प्रयत्नमें एक लंबा समय व्यतीत हो गया, किंतु मेरे प्राणोंकी रक्षाके लिये अबतक कोई उपाय हाथ नहीं आया ।। ६२ ।।

येन येन विशेषण कर्मणा येन केनचित् । अभ्युज्जीवेत् साद्यमानः समर्थो धर्ममाचरेत् ।। ६३ ।। ‘जो भूखों मर रहा हो, वह जिस-जिस उपायसे अथवा जिस किसी भी कर्मसे सम्भव हो, अपने जीवनकी रक्षा करे, फिर समर्थ होनेपर वह धर्मका आचरण कर सकता है ।। ६३ ।।

ऐन्द्रो धर्मः क्षत्रियाणां ब्राह्मणानामथाग्निकः । ब्रह्मवह्निर्मम बलं भक्ष्यामि शमयन् क्षुधाम् ।। ६४ ।। ‘इन्द्रदेवताका जो पालनरूप धर्म है, वही क्षत्रियोंका भी है और अग्निदेवका जो सर्वभक्षित्व नामक गुण है, वह ब्राह्मणोंका है। मेरा बल वेदरूपी अग्नि है; अतः मैं क्षुधाकी शान्तिके लिये सब कुछ भक्षण करूँगा ।।

यथा यथैव जीवेद्धि तत् कर्तव्यमहेलया । जीवितं मरणाच्छ्रेयो जीवन् धर्ममवाप्नुयात् ।। ६५ ।। ‘जैसे-जैसे ही जीवन सुरक्षित रहे, उसे बिना अवहेलनाके करना चाहिये। मरनेसे जीवित रहना श्रेष्ठ है, क्योंकि जीवित पुरुष पुनः धर्मका आचरण कर सकता है ।।

सोऽहं जीवितमाकाङ्क्षन्नभक्ष्यस्यापि भक्षणम् । व्यवस्ये बुद्धिपूर्वं वै तद् भवाननुमन्यताम् ।। ६६ ।। ‘इसलिये मैंने जीवनकी आकांक्षा रखकर इस अभक्ष्य पदार्थका भी भक्षण कर लेनेका बुद्धिपूर्वक निश्चय किया है। इसका तुम अनुमोदन करो ।। ६६ ।।

बलवन्तं करिष्यामि प्रणोत्स्याम्यशुभानि तु । तपोभिर्विद्यया चैव ज्योतींषीव महत्तमः ।। ६७ ।।