महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 950, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'जैसे सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रह महान् अन्धकारका नाश कर देते हैं, उसी प्रकार मैं पुनः तप और विद्याद्वारा जब अपने-आपको सबल कर लूँगा, तब सारे अशुभ कर्मोंका नाश कर डालूँगा' ।। ६७ ।।
श्वपच उवाच
नैतत् खादन् प्राप्नुते दीर्घमायु-
नैव प्राणानामृतस्येव तृप्तिः ।
भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोऽस्तु
श्वभक्षणे श्वा ह्यभक्ष्यो द्विजानाम् ॥ ६८ ॥
**चाण्डालने कहा—**मुने! इसे खाकर कोई बहुत बड़ी आयु नहीं प्राप्त कर सकता। न तो इससे प्राणशक्ति प्राप्त होती है और न अमृतके समान तृप्ति ही होती है; अतः आप कोई दूसरी भिक्षा माँगिये। कुत्तेका मांस खानेकी ओर आपका मन नहीं जाना चाहिये। कुत्ता द्विजोंके लिये अभक्ष्य है ॥ ६८ ॥
विश्वामित्र उवाच
न दुर्भिक्षे सुलभं मांसमन्यत्
श्वपाक मन्ये नच मेऽस्ति वित्तम् ।
क्षुधार्तश्चाहमगतिर्निराशः
श्वमांसे चास्मिन् षड्रसान् साधु मन्ये ॥ ६९ ॥
**विश्वामित्र बोले—**श्वपाक! सारे देशमें अकाल पड़ा है; अतः दूसरा कोई मांस सुलभ नहीं होगा, यह मेरी दृढ़ मान्यता है। मेरे पास धन नहीं है कि मैं भोज्य पदार्थ खरीद सकूँ, इधर भूखसे मेरा बुरा हाल है। मैं निराश्रय तथा निराश हूँ। मैं समझता हूँ कि मुझे इस कुत्तेके मांसमें ही षड्रस भोजनका आनन्द भलीभाँति प्राप्त होगा ॥ ६९ ॥
श्वपच उवाच
पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रस्य वै विशः ।
यथा शास्त्रं प्रमाणं ते माभक्ष्ये मानसं कृथाः ॥ ७० ॥
**चाण्डालने कहा—**ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिये पाँच नखोंवाले पाँच प्रकारके प्राणी आपत्कालमें भक्ष्य बताये गये हैं। यदि आप शास्त्रको प्रमाण मानते हैं तो अभक्ष्य पदार्थकी ओर मन न ले जाइये ॥ ७० ॥
विश्वामित्र उवाच
अगस्त्येनासुरो जग्धो वातापिः क्षुधितेन वै । अहमापदगतः क्षुत्तो भक्षयिष्ये श्वजाघनीम् ॥ ७१ ॥