महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 951, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविश्वामित्र बोले— भूखे हुए महर्षि अगस्त्यने वातापि नामक असुरको खा लिया था। मैं तो क्षुधाके कारण भारी आपत्तिमें पड़ गया हूँ; अतः यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७१ ॥
श्वपच उवाच
भिक्षामन्यामाहरेति न च कर्तुमिहार्हसि ।
न नूनं कार्यमेतद् वै हर कामं श्वजाघनीम् ॥ ७२ ॥
चाण्डालने कहा— मुने! आप दूसरी भिक्षा ले आइये। इसे ग्रहण करना आपके लिये उचित नहीं है। आपकी इच्छा हो तो यह कुत्तेकी जाँघ ले जाइये; परंतु मैं निश्चितरूपसे कहता हूँ कि आपको इसका भक्षण नहीं करना चाहिये ॥ ७२ ॥
विश्वामित्र उवाच
शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तये ।
परां मेध्याशनामेनां भक्ष्यां मन्ये श्वजाघनीम् ॥ ७३ ॥
विश्वामित्र बोले— शिष्टपुरुष ही धर्मकी प्रवृत्तिके कारण हैं। मैं उन्हींके आचारका अनुसरण करता हूँ; अतः इस कुत्तेकी जाँघको मैं पवित्र भोजनके समान ही भक्षणीय मानता हूँ ॥ ७३ ॥
श्वपच उवाच
असता यत् समाचीर्णं न च धर्मः सनातनः ।
नाकार्यमिह कार्यं वै मा छलेनाशुभं कृथाः ॥ ७४ ॥
चाण्डालने कहा— किसी असाधु पुरुषने यदि कोई अनुचित कार्य किया हो तो वह सनातन धर्म नहीं माना जायगा; अतः आप यहाँ न करनेयोग्य कर्म न कीजिये। कोई बहाना लेकर पाप करनेपर उतारू न हो जाइये ॥
विश्वामित्र उवाच
न पातकं नावमतमृषिः सन् कर्तुमर्हति ।
समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद् भोक्ष्ये श्वजाघनीम् ॥ ७५ ॥
विश्वामित्र बोले— कोई श्रेष्ठ ऋषि ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जो पातक हो अथवा जिसकी निन्दा की गयी हो। कुत्ते और मृग दोनों ही पशु होनेके कारण मेरे मतमें समान हैं, अतः मैं यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७५ ॥
श्वपच उवाच
यद् ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन
तेनर्षिणा तदवस्थाधिकारे ।