महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 952, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस वै धर्मो यत्र न पापमस्ति सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्याः ॥ ७६ ॥ **चाण्डालने कहा—**महर्षि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना की जानेपर वैसी अवस्थामें वातापिका भक्षणरूप कार्य किया था (उनके वैसा करनेसे बहुतसे ब्राह्मणोंकी रक्षा हो गयी; अन्यथा वह राक्षस उन सबको खा जाता; अतः महर्षिका वह कार्य धर्म ही था)। धर्म वही है, जिसमें लेशमात्र भी पाप न हो। ब्राह्मण गुरुजन हैं; अतः सभी उपायोंसे उनकी एवं उनके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ७६ ॥
विश्वामित्र उवाच
मित्रं च मे ब्राह्मणस्यायमात्मा प्रियश्च मे पूज्यतमश्च लोके । तं धर्तुकामोऽहमिमां जिहीर्षे नृशंसनामीदृशानां न बिभ्ये ॥ ७७ ॥ विश्वामित्र बोले—(यदि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये वह कार्य किया था तो मैं भी मित्रकी रक्षाके लिये उसे करूँगा) यह ब्राह्मणका शरीर मेरा मित्र ही है। यही जगत्में मेरे लिये परम प्रिय और आदरणीय है। इसीको जीवित रखनेके लिये मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाना चाहता हूँ, अतः ऐसे नृशंस कर्मोंसे मुझे तनिक भी भय नहीं होता है ॥ ७७ ॥
श्वपच उवाच
कामं नरा जीवितं संत्यजन्ति न चाभक्ष्ये क्वचित् कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वान् कामान् प्राप्नुवन्तीह विद्वन् प्रियस्व कामं सहितः क्षुधैव ॥ ७८ ॥ **चाण्डालने कहा—**विद्वन्! अच्छे पुरुष अपने प्राणोंका परित्याग भले ही कर दें, परंतु वे कभी अभक्ष्य-भक्षणका विचार नहीं करते हैं। इसीसे वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं; अतः आप भी भूखके साथ ही—उपवासद्वारा ही अपनी मनःकामनाकी पूर्ति कीजिये ॥ ७८ ॥
विश्वामित्र उवाच
स्थाने भवेत् संशयः प्रेत्यभावे निःसंशयः कर्मणां वै विनाशः । अहं पुनर्व्रतनित्यः शमात्मा मूलं रक्ष्यं भक्षयिष्याम्यभक्ष्यम् ॥ ७९ ॥