महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुहृद् भूत्वानुशासे त्वां कृपा हि त्वयि मे द्विज । यदिदं श्रेय आधत्स्व मा लोभात् पातकं कृथाः ॥ ८३ ॥ चाण्डालने कहा— ब्रह्मन्! मैं तो आपका हितैषी सुहृद् बनकर ही यह धर्माचरणकी सलाह दे रहा हूँ; क्योंकि आपपर मुझे दया आ रही है। यह जो कल्याणकी बात बता रहा हूँ, इसे आप ग्रहण करें। लोभवश पाप न करें ॥
विश्वामित्र उवाच
सुहृन्मे त्वं सुखेप्सुश्चेदापदो मां समुद्धर । जानेऽहं धर्मतोऽऽत्मानं शौनीमुत्सृज जाघनीम् ॥ ८४ ॥ विश्वामित्र बोले— भैया! यदि तुम मेरे हितैषी सुहृद् हो और मुझे सुख देना चाहते हो तो इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो। मैं अपने धर्मको जानता हूँ। तुम तो यह कुत्तेकी जाँघ मुझे दे दो ॥ ८४ ॥
श्वपच उवाच
नैवोत्सहे भवतो दातुमेतां नोपेक्षितुं ह्रियमाणं स्वमन्नम् । उभौ स्यावः पापलोकावलिप्तौ दाता चाहं ब्राह्मणस्त्वं प्रतीच्छन् ॥ ८५ ॥ चाण्डालने कहा— ब्रह्मन्! मैं यह अभक्ष्य वस्तु आपको नहीं दे सकता और मेरे इस अन्नका आपके द्वारा अपहरण हो, इसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकता। इसे देनेवाला मैं और लेनेवाले आप ब्राह्मण दोनों ही पापलिप्त होकर नरकमें पड़ेंगे ॥ ८५ ॥
विश्वामित्र उवाच
अद्याहमेतद् वृजिनं कर्म कृत्वा जीवंश्चरिष्यामि महापवित्रम् । स पूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये यदेतयोर्गुरु तद् वै ब्रवीहि ॥ ८६ ॥ विश्वामित्र बोले— आज यह पापकर्म करके भी यदि मैं जीवित रहा तो परम पवित्र धर्मका अनुष्ठान करूँगा। इससे मेरे तन, मन पवित्र हो जायँगे और मैं धर्मका ही फल प्राप्त करूँगा। जीवित रहकर धर्माचरण करना और उपवास करके प्राण देना—इन दोनोंमें कौन बड़ा है, यह मुझे बताओ ॥ ८६ ॥
श्वपच उवाच
आत्मैव साक्षी कुलधर्मकृत्ये त्वमेव जानासि यदत्र दुष्कृतम् ।