भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 955

यो ह्याद्रियाद् भक्ष्यमिति श्वमांसं मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीयम् ॥ ८७ ॥ चाण्डालने कहा—किस कुलके लिये कौन-सा कार्य धर्म है, इस विषयमें यह आत्मा ही साक्षी है। इस अभक्ष्य-भक्षणमें जो पाप है, उसे आप भी जानते हैं। मेरी समझमें जो कुत्तेके मांसको भक्षणीय बताकर उसका आदर करे, उसके लिये इस संसारमें कुछ भी त्याज्य नहीं है ॥ ८७ ॥

विश्वामित्र उवाच

उपादाने खादने चास्ति दोषः कार्यात्यये नित्यमत्रापवादः । यस्मिन् हिंसा नानृतं वाच्यलेशो- ऽभक्ष्यक्रिया यत्र न तद्गरीयः ॥ ८८ ॥ विश्वामित्र बोले—चाण्डाल! मैं इसे मानता हूँ कि तुमसे दान लेने और इस अभक्ष्य वस्तुको खानेमें दोष है फिर भी जहाँ न खानेसे प्राण जानेकी सम्भावना हो, वहाँके लिये शास्त्रोंमें सदा ही अपवाद वचन मिलते हैं। जिसमें हिंसा और असत्यका तो दोष है ही नहीं, लेशमात्र निन्दारूप दोष है। प्राण जानेके अवसरोंपर भी जो अभक्ष्य-भक्षणका निषेध ही करनेवाले वचन हैं, वे गुरुतर अथवा आदरणीय नहीं हैं ॥ ८८ ॥

श्वपच उवाच

यद्येष हेतुस्तव खादने स्या- न्न ते वेदः कारणं नार्यधर्मः । तस्माद् भक्ष्येऽभक्षणे वा द्विजेन्द्र दोषं न पश्यामि यथेदमत्र ॥ ८९ ॥ चाण्डालने कहा—द्विजेन्द्र! यदि इस अभक्ष्य वस्तु-को खानेमें आपके लिये यह प्राणरक्षारूपी हेतु ही प्रधान है तब तो आपके मतमें न वेद प्रमाण है और न श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार-धर्म ही। अतः मैं आपके लिये भक्ष्य वस्तुके अभक्षणमें अथवा अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें कोई दोष नहीं देख रहा हूँ, जैसा कि यहाँ आपका इस मांसके लिये यह महान् आग्रह देखा जाता है ॥ ८९ ॥

विश्वामित्र उवाच

नैवातिपापं भक्ष्यमाणस्य दृष्टं सुरां तु पीत्वा पततीति शब्दः । अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव न पापमात्रेण कृतं हिनस्ति ॥ ९० ॥