भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 966, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 966

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
शरणं पाल्यानस्य यो धर्मस्तं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— परमबुद्धिमान् पितामह! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं; अतः मुझे यह बताइये कि शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्राणीको किस धर्मकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

महान् धर्मो महाराज शरणागतपालने ।
अर्हः प्रष्टुं भवांश्चैव प्रश्नं भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— महाराज! शरणागतकी रक्षा करनेमें महान् धर्म है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हीं ऐसा प्रश्न पूछनेके अधिकारी हो ॥ २ ॥
शिबिप्रभृतयो राजन् राजानः शरणागतान् ।
परिपाल्य महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ ३ ॥
राजन्! शिबि आदि महात्मा राजाओंने तो शरणागतोंकी रक्षा करके ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥
श्रूयते च कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ ४ ॥
यह भी सुना जाता है कि एक कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रु का यथायोग्य सत्कार किया था और अपना मांस खानेके लिये उसको निमन्त्रित किया था ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं कपोतेन पुरा शत्रुः शरणमागतः ।
स्वमांसं भोजितः कां च गतिं लेभे स भारत ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! प्राचीनकालमें कबूतरने शरणागत शत्रुको किस प्रकार अपना मांस खिलाया और ऐसा करनेसे उसे कौन-सी सद्गति प्राप्त हुई ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच