भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 967, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 967

शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । नृपतेर्मुचुकुन्दस्य कथितां भार्गवेन वै ॥ ६ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! वह दिव्य कथा सुनो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। परशुरामजीने राजा मुचुकुन्दको यह कथा सुनायी थी ॥ ६ ॥

इममर्थं पुरा पार्थ मुचुकुन्दो नराधिपः । भार्गवं परिपप्रच्छ प्रणतः पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥ पुरुषप्रवर कुन्तीनन्दन! पहलेकी बात है, राजा मुचुकुन्दने परशुरामजीको प्रणाम करके उनसे यही प्रश्न किया था ॥ ७ ॥

तस्मै शुश्रूषमाणाय भार्गवोऽकथयत् कथाम् । इमां यथा कपोतेन सिद्धिः प्राप्ता नराधिप ॥ ८ ॥ नरेश्वर! तब परशुरामजीने सुननेके लिये उत्सुक हुए मुचुकुन्दको कबूतरने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्ति की थी, वह कथा कह सुनायी ॥ ८ ॥

मुनिरुवाच

धर्मनिश्चयसंयुक्तां कामार्थसहितां कथाम् । शृणुष्वावहितो राजन् गदतो मे महाभुज ॥ ९ ॥ **मुनि बोले—**महाबाहो! यह कथा धर्मके निर्णयसे युक्त तथा अर्थ और कामसे सम्पन्न है। राजन्! तुम सावधान होकर मेरे मुखसे इस कथाको सुनो ॥ ९ ॥

कश्चित् क्षुद्रसमाचारः पृथिव्यां कालसम्मितः । विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १० ॥ एक समयकी बात है किसी महान् वनमें कोई भयंकर बहेलिया चारों ओर विचर रहा था। वह बड़े खोटे आचार-विचारका था। पृथिवीपर वह कालके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥

काकोल इव कृष्णाङ्गो रक्ताक्षः कालसम्मितः । दीर्घजङ्घो ह्रस्वपादो महावक्त्रो महाहनुः ॥ ११ ॥ उसका सारा शरीर 'काकोल' जातिके कौओंके समान काला था। आँखें लाल-लाल थीं। वह देखनेपर काल-सा प्रतीत होता था। बड़ी-बड़ी पिंडलियाँ, छोटे-छोटे पैर, विशाल मुख और लंबी-सी ठोढ़ी—यही उसकी हुलिया थी ॥ ११ ॥

नैव तस्य सुहृत् कश्चिन्न सम्बन्धी न बान्धवाः । स हि तैः सम्परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १२ ॥ उसके न कोई सुहृद्, न सम्बन्धी और न भाई-बन्धु ही थे। उसके भयानक क्रूर-कर्मके कारण सबने उसे त्याग दिया था ॥ १२ ॥

नरः पापसमाचारस्त्यक्तव्यो दूरतो बुधैः ।