महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 972, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्य नायाति मे कान्ता न कार्यं जीवितेन मे ॥ ७ ॥ ‘जिसके नेत्रोंके प्रान्तभाग कुछ-कुछ लाल हैं, अंग चितकबरे हैं और स्वरमें अद्भुत मिठास भरा है, वह मेरी प्राणवल्लभा यदि आज नहीं आ रही है तो मुझे इस जीवनसे क्या प्रयोजन है? ॥ ७ ॥
न भुङ्क्ते मय्यभुक्ते या नास्नाते स्नाति सुव्रता । नातिष्ठत्युपतिष्ठेत शेते च शयिते मयि ॥ ८ ॥ ‘वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिव्रता थी, इसलिये मुझे भोजन कराये बिना भोजन नहीं करती, नहलाये बिना स्नान नहीं करती, मुझे बैठाये बिना बैठती नहीं तथा मेरे सो जानेपर ही शयन करती थी ॥ ८ ॥
हृष्टे भवति सा हृष्टा दुःखिते मयि दुःखिता । प्रोषिते दीनवदना क्रुद्धे च प्रियवादिनी ॥ ९ ॥ ‘मेरे प्रसन्न रहनेपर वह हर्षसे खिल उठती थी और मेरे दुखी होनेपर वह स्वयं भी दुःखमें डूब जाती थी। जब मैं बाहर जाने लगता तो उसके मुखपर दीनता छा जाती थी और जब कभी मुझे क्रोध आता, तब मीठी-मीठी बातें करके शान्त कर देती थी ॥ ९ ॥
पतिव्रता पतिगतिः पतिप्रियहिते रता । यस्य स्यात् तादृशी भार्या धन्यः स पुरुषो भुवि ॥ १० ॥ ‘वह बड़ी पतिव्रता थी। पतिके सिवा दूसरी कोई उसकी गति नहीं थी। वह सदा ही पतिके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहती थी। जिसको ऐसी पत्नी प्राप्त हुई हो, वह पुरुष इस पृथ्वीपर धन्य है ॥ १० ॥
सा हि श्रान्तं क्षुधार्तं च जानीते मां तपस्विनी । अनुरक्ता स्थिरा चैव भक्ता स्निग्धा यशस्विनी ॥ ११ ॥ ‘वह तपस्विनी यह जानती है कि मैं थका, माँदा और भूखसे पीड़ित हूँ, सो भी न जाने क्यों नहीं आ रही है? मेरे प्रति उसका अत्यन्त अनुराग है, उसकी बुद्धि स्थिर है, वह यशस्विनी भार्या मेरे प्रति स्नेह रखनेवाली तथा मेरी परम भक्त है ॥ ११ ॥
वृक्षमूलेऽपि दयिता यस्य तिष्ठति तद् गृहम् । प्रासादोऽपि तया हीनः कान्तार इति निश्चितम् ॥ १२ ॥ ‘वृक्षके नीचे भी जिसकी पत्नी साथ हो, उसके लिये वही घर है और बहुत बड़ी अट्टालिका भी यदि स्त्रीसे रहित है तो वह निश्चय ही दुर्गम गहन वनके समान है ॥
धर्मार्थकामकालेषु भार्या पुंसः सहायिनी । विदेशगमने चास्य सैव विश्वासकारिका ॥ १३ ॥ ‘पुरुषके धर्म, अर्थ और कामके अवसरोंपर उसकी पत्नी ही उसकी मुख्य सहायिका होती है। परदेश जानेपर भी वही उसके लिये विश्वसनीय मित्रका काम करती है ॥ १३ ॥
भार्या हि परमो ह्यर्थः पुरुषस्येह पठ्यते ।