भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 973

असहायस्य लोकेऽस्मिंल्लोकयात्रासहायिनी ।। १४ ।। ‘पुरुषकी प्रधान सम्पत्ति उसकी पत्नी ही कही जाती है। इस लोकमें जो असहाय है, उसे भी लोक-यात्रामें सहायता देनेवाली उसकी पत्नी ही है ।। १४ ।।

तथा रोगाभिभूतस्य नित्यं कृच्छ्रगतस्य च । नास्ति भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् ।। १५ ।। ‘जो पुरुष रोगसे पीड़ित हो और बहुत दिनोंसे विपत्तिमें फँसा हो, उस पीड़ित मनुष्यके लिये भी स्त्रीके समान दूसरी कोई ओषधि नहीं है ।। १५ ।।

नास्ति भार्यासमो बन्धुर्नास्ति भार्यासमा गतिः । नास्ति भार्यासमो लोके सहायो धर्मसंग्रहे ।। १६ ।। ‘संसारमें स्त्रीके समान कोई बन्धु नहीं है, स्त्रीके समान कोई आश्रय नहीं है और स्त्रीके समान धर्मसंग्रहमें सहायक भी दूसरा कोई नहीं है ।। १६ ।।

यस्य भार्या गृहे नास्ति साध्वी च प्रियवादिनी । अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ।। १७ ।। ‘जिसके घरमें साध्वी और प्रिय वचन बोलने-वाली भार्या नहीं है, उसे तो वनमें चला जाना चाहिये; क्योंकि उसके लिये जैसा घर है, वैसा ही वन' ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि भार्याप्रशंसायां चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४४ ।। इस प्रकार श्रीमद्महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पत्नीकी प्रशंसाविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४४ ।।