महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 983, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति
भीष्म उवाच
ततो गते शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता ।
संस्मृत्य सा च भर्तारं रुदती शोककर्शिता ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस बहेलियेके चले जानेपर कबूतरी अपने पतिका स्मरण करके शोकसे कातर हो उठी और दुःखमग्न हो रोती हुई विलाप करने लगी ॥ १ ॥
नाहं ते विप्रियं कान्त कदाचिदपि संस्मरे ।
सर्वापि विधवा नारी बहुपुत्रापि शोचते ॥ २ ॥
‘प्रियतम! आपने कभी मेरा अप्रिय किया हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। सारी स्त्रियाँ अनेक पुत्रोंसे युक्त होनेपर भी पतिहीन होनेपर शोकमें डूब जाती हैं ॥
शोच्या भवति बन्धूनां पतिहीना तपस्विनी ।
लालिताहं त्वया नित्यं बहुमानाच्च पूजिता ॥ ३ ॥
‘पतिहीन तपस्विनी नारी अपने भाई-बन्धुओंके लिये भी शोचनीय बन जाती है। आपने सदा ही मेरा लाड-प्यार किया और बड़े सम्मानके साथ मुझे आदरपूर्वक रक्खा ॥ ३ ॥
वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसंक्लिष्टमनोहरैः ।
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च ॥ ४ ॥
द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताहं त्वया सह ।
आकाशगमने चैव विहृताहं त्वया सुखम् ॥ ५ ॥
‘आपने स्नेहसिक्त, सुखद, मनोहर, तथा मधुर वचनोंद्वारा मुझे आनन्दित किया। मैंने आपके साथ पर्वतोंकी गुफाओंमें नदियोंके तटोंपर, झरनोंके आस-पास तथा वृक्षोंकी सुरम्य शिखाओंपर रमण किया है। आकाशयात्रामें भी मैं सदा आपके साथ सुखपूर्वक विचरण करती रही हूँ ॥ ४-५ ॥
रमामि स्म पुरा कान्त तन्मे नास्त्यद्य किञ्चन ।
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ॥ ६ ॥
अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ।
‘प्राणनाथ! पहले मैं जिस प्रकार आपके साथ आनन्दपूर्वक रमण करती थी, अब उन सब सुखोंमेंसे कुछ भी मेरे लिये शेष नहीं रह गया है। पिता, भ्राता और पुत्र—ये सब लोग