भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 984

नारीको परिमित सुख देते हैं, केवल पति ही उसे अपरिमित या असीम सुख प्रदान करता है। ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी? ।। नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम् ।। ७ ।। विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियाः । ‘स्त्रीके लिये पतिके समान कोई रक्षक नहीं है और पतिके तुल्य कोई सुख नहीं है। उसके लिये तो धन और सर्वस्वको त्यागकर पति ही एकमात्र गति है ।। न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वया विना ।। ८ ।। पतिहीना तु का नारी सती जीवितुमुत्सहेत् । ‘नाथ! अब तुम्हारे बिना यहाँ इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है? ऐसी कौन सी पतिव्रता स्त्री होगी, जो पतिके बिना जीवित रह सकेगी? ।। ८ १/२ ।। एवं विलप्य बहुधा करुणं सा सुदुःखिता ।। ९ ।। पतिव्रता सम्प्रदीप्तं प्रविवेश हुताशनम् । इस तरह अनेक प्रकारसे करुणाजनक विलाप करके अत्यन्त दुःखमें डूबी हुई वह पतिव्रता कबूतरी उसी प्रज्वलित अग्निमें समा गयी ।। ९ १/२ ।। ततश्चित्राङ्गदधरं भर्तारं सान्वपश्यत ।। १० ।। विमानस्थं सुकृतिभिः पूज्यमानं महात्मभिः । तदनन्तर उसने अपने पतिको देखा। वह विचित्र अंगद धारण किये विमानपर बैठा था और बहुत-से पुण्यात्मा महात्मा उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे ।। १० १/२ ।। चित्रमाल्याम्बरधरं सर्वाभरणभूषितम् ।। ११ ।। विमानशतकोटीभिरावृतं पुण्यकर्मभिः । उसने विचित्र हार और वस्त्र धारण कर रक्खे थे और वह सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित था। अरबों पुण्यकर्मी पुरुषोंसे युक्त विमानोंने उसे घेर रक्खा था ।। ततः स्वर्गं गतः पक्षी विमानवरमास्थितः । कर्मणा पूजितस्तत्र रेमे स सह भार्यया ।। १२ ।। इस प्रकार श्रेष्ठ विमानपर बैठा हुआ वह पक्षी अपनी स्त्रीके सहित स्वर्गलोकको चला गया और अपने सत्कर्मसे पूजित हो वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगा ।। १२ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतस्वर्गगमने अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतरका स्वर्गगमनविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४८ ।।