भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति

भीष्म उवाच

विमानस्थौ तु तौ राजन् लुब्धकः खे ददर्श ह ।
दृष्ट्वा तौ दम्पती राजन् व्यचिन्तयत तां गतिम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! व्याधने उन दोनों पक्षियोंको दिव्य रूप धारण करके विमान पर बैठे और आकाशमार्गसे जाते देखा। उन दिव्य दम्पतिको देखकर व्याध उनकी उस सद्गतिके विषयमें विचार करने लगा ॥ १ ॥

ईदृशेनैव तपसा गच्छेयं परमां गतिम् ।
इति बुद्ध्या विनिश्चित्य गमनायोपचक्रमे ॥ २ ॥
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धकः पक्षिजीवकः ।
निश्चेष्टो मरुदाहारो निर्ममः स्वर्गकांक्षया ॥ ३ ॥

मैं भी इसी प्रकार तपस्या करके परम गतिको प्राप्त होऊँगा, ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके पक्षियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला वह बहेलिया वहाँसे महाप्रस्थानके पथका आश्रय लेकर चल दिया। उसने सब प्रकारकी चेष्टा त्याग दी। वायु पीकर रहने लगा। स्वर्गकी अभिलाषासे अन्य सब वस्तुओंकी ओरसे उसने ममता हटा ली ॥ २-३ ॥

ततोऽपश्यत् सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्माविभूषितम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं सरः शीतलजलं शिवम् ॥ ४ ॥

आगे जाकर उसने एक विस्तृत एवं मनोरम सरोवर देखा जो कमल-समूहोंसे सुशोभित हो रहा था। नाना प्रकारके जलपक्षी उसमें कलरव कर रहे थे। वह तालाब शीतलजलसे भरा था और अत्यन्त सुखद जान पड़ता था ॥ ४ ॥

पिपासार्तोऽपि तद् दृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशयः ।
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुब्धकः ॥ ५ ॥
अनवेक्ष्यैव संहृष्टः श्वापदाध्युषितं वनम् ।
महान्तं निश्चयं कृत्वा लुब्धकः प्रविवेश ह ॥ ६ ॥
प्रविशन्नेव स वनं निगृहीतः सकण्टकैः ।
स कण्टकैर्विभिन्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः ॥ ७ ॥

राजन्! कोई मनुष्य कितनी ही प्याससे पीड़ित क्यों न हो, निःसंदेह उस सरोवरके दर्शनमात्रसे वह तृप्त हो सकता था। इधर यह व्याध उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गया था, तो भी उधर दृष्टिपात किये बिना ही बड़े हर्षके साथ हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए वनमें प्रवेश कर गया। महान् लक्ष्यपर पहुँचनेका निश्चय करके बहेलिया उस वनमें घुसा।