भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 989

दह्यमानः पापकृत्या जगाम जनमेजयः ॥ ७ ॥
चरिष्यमाण इन्द्रोतं शौनकं संशितव्रतम् ।
राजन्! यहाँ मैं जो इतिहास बता रहा हूँ, वह धर्मकी वृद्धि करनेवाला है। राजा जनमेजय अपने पाप-कर्मसे दग्ध होते और वनमें विचरते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाले शुनकवंशी इन्द्रोत मुनिके पास जा पहुँचे ॥ ७१/२ ॥
समासाद्योपजग्राह पादयोः परिपीडयन् ॥ ८ ॥
ऋषिर्दृष्ट्वा नृपं तत्र जगर्हे सुभृशं तदा ।
कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ॥ ९ ॥
किं त्वयास्मासु कर्तव्यं मा मां स्प्राक्षीः कथंचन ।
गच्छ गच्छ न ते स्थानं प्रीणात्यस्मानिति ब्रुवन् ॥ १० ॥
वहाँ जाकर उन्होंने मुनिके दोनों पैर पकड़ लिये और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगे। ऋषिने वहाँ राजाको देखकर उस समय उनकी बड़ी निन्दा की। वे कहने लगे—अरे! तू तो महान् पापाचारी और ब्रह्महत्यारा है। यहाँ कैसे आया? हमलोगोंसे तेरा क्या काम है? मुझे किसी तरह छूना मत। जा-जा, तेरा यहाँ ठहरना हमलोगोंको अच्छा नहीं लगता ॥ ८—१० ॥
रुधिरस्येव ते गन्धः शवस्येव च दर्शनम् ।
अशिवः शिवसंकाशो मृतो जीवन्निवाटसि ॥ ११ ॥
‘तुमसे रुधिरकी-सी गन्ध निकलती है। तेरा दर्शन वैसा ही है, जैसा मुर्देका दीखना। तू देखनेमें मंगलमय है; परंतु है अमंगलरूप। वास्तवमें तू मर चुका; परंतु जीवित की भाँति घूम रहा है ॥ ११ ॥
ब्रह्ममृत्युरशुद्धात्मा पापमेवानुचिन्तयन् ।
प्रबुद्ध्यसे प्रस्वपिषि वर्तसे परमे सुखे ॥ १२ ॥
‘तू ब्राह्मणकी मृत्युका कारण है। तेरा अन्तःकरण नितान्त अशुद्ध है। तू पापकी ही बात सोचता हुआ जागता और सोता है और इसीसे अपनेको परम सुखी मानता है ॥ १२ ॥
मोघं ते जीवितं राजन् परिक्लिष्टं च जीवसि ।
पापायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे हि यवीयसे ॥ १३ ॥
‘राजन्! तेरा जीवन व्यर्थ और अत्यन्त क्लेशमय है। तू पापके लिये ही पैदा हुआ है। खोटे कर्मके लिये ही तेरा जन्म हुआ है ॥ १३ ॥
बहुकल्याणमिच्छन्ति ईहन्ते पितरः सुतान् ।
तपसा दैवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षया ॥ १४ ॥
माता-पिता तपस्या, देवपूजा, नमस्कार और सहनशीलता या क्षमा आदिके द्वारा पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और प्राप्त हुए पुत्रोंसे परम कल्याण पानेकी इच्छा रखते हैं ॥ १४ ॥
पितृवंशमिमं पश्य त्वत्कृते नरकं गतम् ।