भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 990, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 990

निरर्थाः सर्व एवैषामाशाबन्धास्त्वदाश्रयाः ॥ १५ ॥ ‘परंतु तेरे कारण तेरे पितरोंका यह समुदाय नरकमें पड़ गया है। तू आँख उठाकर उनकी दशा देख ले। उन्होंने तुझसे जो जो आशाएँ बाँध रखी थीं, उनकी वे सभी आशाएँ आज व्यर्थ हो गयीं ॥ १५ ॥

यान् पूजयन्तो विन्दन्ति स्वर्गमायुर्यशः प्रजाः ।
तेषु त्वं सततं द्वेष्टा ब्राह्मणेषु निरर्थकः ॥ १६ ॥
‘जिनकी पूजा करनेवाले लोग स्वर्ग, आयु, यश और संतान प्राप्त करते हैं। उन्हीं ब्राह्मणोंसे तू सदा द्वेष रखता है। तेरा जीवन व्यर्थ है ॥ १६ ॥

इमं लोकं विमुच्य त्वमवाङ्‌मूर्द्धा पतिष्यसि ।
अशाश्वतीः शाश्वतीश्च समाः पापेन कर्मणा ॥ १७ ॥
‘इस लोकको छोड़नेके बाद तू अपने पापकर्मके फलस्वरूप अनन्त वर्षोंतक नीचा सिर किये नरकमें पड़ा रहेगा ॥ १७ ॥

अर्द्यमानो यत्र गृध्रैः शितिकण्ठैरयोमुखैः ।
ततश्च पुनरावृत्तः पापयोनिं गमिष्यसि ॥ १८ ॥
‘वहाँ लोहेके समान चोंचवाले गीध और मोर तुझे नोच-नोचकर पीड़ा देंगे और उसके बाद भी नरकसे लौटनेपर तुझे किसी पापयोनिमें ही जन्म लेना पड़ेगा ॥

यदिदं मन्यसे राजन् नायमस्ति कुतः परः ।
प्रतिस्मारयितारस्त्वां यमदूता यमक्षये ॥ १९ ॥
‘राजन्! तू जो यह समझता है कि जब इसी लोकमें पापका फल नहीं मिल रहा है, तब परलोकका तो अस्तित्व ही कहाँ है? सो इस धारणाके विपरीत यमलोकमें जानेपर यमराजके दूत तुझे इन सारी बातोंकी याद दिला देंगे ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीयसंवादे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवादविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥


१. ये परिक्षित् और जनमेजय अर्जुनके पौत्र और प्रपौत्र नहीं हैं।