भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1011, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1011

घातकः खादकार्थाय तद् घातयति वै नरः ॥ २९ ॥ यदि कोई भी मांस खानेवाला न रह जाय तो पशुओंकी हिंसा करनेवाला भी कोई न रहे; क्योंकि हत्यारा मनुष्य मांस खानेवालोंके लिये ही पशुओंकी हिंसा करता है ॥ २९ ॥

अभक्ष्यमेतदिति वै इति हिंसा निवर्तते । खादकार्थमतो हिंसा मृगादीनां प्रवर्तते ॥ ३० ॥ यदि मांसको अभक्ष्य समझकर सब लोग उसे खाना छोड़ दें तो पशुओंकी हत्या स्वतः ही बंद हो जाय; क्योंकि मांस खानेवालोंके लिये ही मृग आदि पशुओंकी हत्या होती है ॥ ३० ॥

यस्माद् ग्रसति चैवायुर्हिंसकानां महाद्युते । तस्माद् विवर्जयेन्मांसं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ३१ ॥ महातेजस्वी नरेश! हिंसकोंकी आयुको उनका पाप ग्रस लेता है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, वह मनुष्य मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१ ॥

त्रातारं नाधिगच्छन्ति रौद्राः प्राणिविहिंसकाः । उद्वेजनीया भूतानां यथा व्यालमृगास्तथा ॥ ३२ ॥ जैसे यहाँ हिंसक पशुओंका लोग शिकार खेलते हैं और वे पशु अपने लिये कहीं कोई रक्षक नहीं पाते, उसी प्रकार प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले भयंकर मनुष्य दूसरे जन्ममें सभी प्राणियोंके उद्वेगपात्र होते हैं और अपने लिये कोई संरक्षक नहीं पाते हैं ॥ ३२ ॥

लोभाद् वा बुद्धिमोहाद् वा बलवीर्यार्थमेव च । संसर्गादथ पापानामधर्मरुचिता नृणाम् ॥ ३३ ॥ लोभसे, बुद्धिके मोहसे, बल-वीर्यकी प्राप्तिके लिये अथवा पापियोंके संसर्गमें आनेसे मनुष्योंकी अधर्ममें रुचि हो जाती है ॥ ३३ ॥

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । उद्विग्नवासो वसति यत्र यत्राभिजायते ॥ ३४ ॥ जो दूसरोंके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, चैनसे नहीं रहने पाता है ॥ ३४ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । मांसस्याभक्षणं प्राहुर्नियताः परमर्षयः ॥ ३५ ॥ नियमपरायण महर्षियोंने मांस-भक्षणके त्यागको ही धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्तिका प्रधान उपाय और परमकल्याणका साधन बतलाया है ॥ ३५ ॥

इदं तु खलु कौन्तेय श्रुतमासीत् पुरा मया । मार्कण्डेयस्य वदतो ये दोषा मांसभक्षणे ॥ ३६ ॥ कुन्तीनन्दन! मांसभक्षणमें जो दोष हैं, उन्हें बतलाते हुए मार्कण्डेयजीके मुखसे मैंने पूर्वकालमें ऐसा सुन रखा है— ॥ ३६ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1011, कुल 2566 में से · BharatKosha