महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1012, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयो हि खादति मांसानि प्राणिनां जीवतैषिणाम्। हतानां वा मृतानां वा यथा हन्ता तथैव सः॥ ३७॥ ‘जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंको मारकर अथवा उनके स्वयं मर जानेपर उनका मांस खाता है, वह न मारनेपर भी उन प्राणियोंका हत्यारा ही समझा जाता है॥ ३७॥
धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्चोपभोगतः। घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः॥ ३८॥ खरीदनेवाला धनके द्वारा, खानेवाला उपभोगके द्वारा और घातक वध एवं बन्धनके द्वारा पशुओंकी हिंसा करता है। इस प्रकार यह तीन तरहसे प्राणियोंका वध होता है॥
अखादन्ननुमोदंश्च भावदोषेण मानवः। योऽनुमोदति हन्यन्तं सोऽपि दोषेण लिप्यते॥ ३९॥ ‘जो मांसको स्वयं नहीं खाता पर खानेवालेका अनुमोदन करता है, वह मनुष्य भी भावदोषके कारण मांसभक्षणके पापका भागी होता है। इसी प्रकार जो मारनेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी हिंसाके दोषसे लिप्त होता है॥ ३९॥
अधृष्यः सर्वभूतानामायुष्मान् नीरुजः सदा। भवत्यभक्षयन् मांसं दयावान् प्राणिनामिह॥ ४०॥ ‘जो मनुष्य मांस नहीं खाता और इस जगत्में सब जीवोंपर दया करता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करते और वह सदा दीर्घायु एवं नीरोग होता है॥ ४०॥
हिरण्यदानैर्गोदानैर्भूमिदानैश्च सर्वशः। मांसस्याभक्षणे धर्मो विशिष्ट इति नः श्रुतिः॥ ४१॥ ‘सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करनेसे जो धर्म प्राप्त होता है, मांसका भक्षण न करनेसे उसकी अपेक्षा भी विशिष्ट धर्मकी प्राप्ति होती है। यह हमारे सुननेमें आया है॥ ४१॥
खादकस्य कृते जन्तून् यो हन्यात् पुरुषाधमः। महादोषतरस्तत्र घातको न तु खादकः॥ ४२॥ ‘जो मांस खानेवालोंके लिये पशुओंकी हत्या करता है, वह मनुष्योंमें अधम है। घातकको बहुत भारी दोष लगता है। मांस खानेवालेको उतना दोष नहीं लगता॥ ४२॥
इज्यायज्ञश्रुतिकृतैर्यो मार्गैरबुधोऽधमः। हन्याज्जन्तून् मांसगृध्नुः स वै नरकभाङ्नरः॥ ४३॥ ‘जो मांसलोभी मूर्ख एवं अधम मनुष्य यज्ञ-याग आदि वैदिक मार्गोंके नामपर प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह नरकगामी होता है॥ ४३॥
भक्षयित्वापि यो मांसं पश्चादपि निवर्तते। तस्यापि सुमहान् धर्मो यः पापाद् विनिवर्तते॥ ४४॥