भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1013, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1013

‘जो पहले मांस खानेके बाद फिर उससे निवृत्त हो जाता है, उसको भी अत्यन्त महान् धर्मकी प्राप्ति होती है, क्योंकि वह पापसे निवृत्त हो गया है ।। ४४ ।। आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादकाः सर्व एव ते ।। ४५ ।। ‘जो मनुष्य हत्याके लिये पशु लाता है, जो उसे मारनेकी अनुमति देता है, जो उसका वध करता है तथा जो खरीदता, बेचता, पकाता और खाता है, वे सब-के-सब खानेवाले ही माने जाते हैं। अर्थात् वे सब खानेवालेके समान ही पापके भागी होते हैं’ ।। ४५ ।। इदमन्यत्तु वक्ष्यामि प्रमाणं विधिनिर्मितम् । पुराणमृषिभिर्जुष्टं वेदेषु परिनिष्ठितम् ।। ४६ ।। अब मैं इस विषयमें एक दूसरा प्रमाण बता रहा हूँ, जो साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादित, पुरातन, ऋषियोंद्वारा सेवित तथा वेदोंमें प्रतिष्ठित है ।। ४६ ।। प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः प्रजार्थिभिरुदाहृतः । यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ।। ४७ ।। नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ।। ४७ ।। य इच्छेत् पुरुषोऽत्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् । स वर्जयेत मांसानि प्राणिनामिह सर्वशः ।। ४८ ।। जो मनुष्य अपने आपको अत्यन्त उपद्रवरहित बनाये रखना चाहता हो, वह इस जगत्में प्राणियोंके मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ।। ४८ ।। श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां व्रीहिमयः पशुः । येनायजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ।। ४९ ।। सुना है, पूर्वकल्पमें मनुष्योंके यज्ञमें पुरोडाश आदिके रूपमें अन्नमय पशुका ही उपयोग होता था। पुण्यलोककी प्राप्तिके साधनोंमें लगे रहनेवाले याज्ञिक पुरुष उस अन्नके द्वारा ही यज्ञ करते थे ।। ४९ ।। ऋषिभिः संशयं पृष्टो वसुश्चेदिपतिः पुरा । अभक्ष्यमपि मांसं यः प्राह भक्ष्यमिति प्रभो ।। ५० ।। प्रभो! प्राचीन कालमें ऋषियोंने चेदिराज वसुसे अपना संदेह पूछा था। उस समय वसुने मांसको भी जो सर्वथा अभक्ष्य है, भक्ष्य बता दिया ।। ५० ।। आकाशादवनिं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिः । एतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम् ।। ५१ ।। उस समय आकाशचारी राजा वसु अनुचित निर्णय देनेके कारण आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े। तदनन्तर पृथ्वीपर भी फिर यही निर्णय देनेके कारण वे पातालमें समा गये ।। ५१ ।।