भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1014, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1014

इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ । अभक्षणे सर्वसुखं मांसस्य मनुजाधिप ॥ ५२ ॥ निष्पाप राजेन्द्र! मनुजेश्वर! मेरी कही हुई यह बात भी सुनो—मांस-भक्षण न करनेसे सब प्रकारका सुख मिलता है ॥ ५२ ॥

यस्तु वर्षशतं पूर्णं तपस्तप्येत् सुदारुणम् । यश्चैव वर्जयेन्मांसं सममेतन्मतं मम ॥ ५३ ॥ जो मनुष्य सौ वर्षोंतक कठोर तपस्या करता है तथा जो केवल मांसका परित्याग कर देता है—ये दोनों मेरी दृष्टिमें एक समान हैं ॥ ५३ ॥

कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप । वर्जयेन्मधुमांसानि धर्मो ह्यत्र विधीयते ॥ ५४ ॥ नरेश्वर! विशेषतः शरदृतु, शुक्लपक्षमें मद्य और मांसका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि ऐसा करनेमें धर्म होता है ॥ ५४ ॥

चतुरो वार्षिकान् मासान् यो मांसं परिवर्जयेत् । चत्वारि भद्राण्यवाप्नोति कीर्तिमायुर्यशोबलम् ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य वर्षाके चार महीनोंमें मांसका परित्याग कर देता है, वह चार कल्याणमयी वस्तुओं—कीर्ति, आयु, यश और बलको प्राप्त कर लेता है ॥ ५५ ॥

अथवा मासमेकं वै सर्वमांसान्यभक्षयन् । अतीत्य सर्वदुःखानि सुखं जीवेन्निरामयः ॥ ५६ ॥ अथवा एक महीनेतक सब प्रकारके मांसोंका त्याग करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो सुखी एवं नीरोग जीवन व्यतीत करता है ॥ ५६ ॥

वर्जयन्ति हि मांसानि मासशः पक्षशोऽपि वा । तेषां हिंसानिवृत्तानां ब्रह्मलोको विधीयते ॥ ५७ ॥ जो एक-एक मास अथवा एक-एक पक्षतक मांस खाना छोड़ देते हैं, हिंसासे दूर हटे हुए उन मनुष्योंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है (फिर जो कभी भी मांस नहीं खाते, उनके लाभकी तो कोई सीमा ही नहीं है) ॥ ५७ ॥

मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभिः । सर्वभूतात्मभूतस्थैर्विदितार्थपरावरैः ॥ ५८ ॥ नाभागेनाम्बरीषेण गयेन च महात्मना । आयुनाथानरण्येन दिलीपरघुपूरुभिः ॥ ५९ ॥ कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यतातिना । नृगेण विष्वगश्वेन तथैव शशबिन्दुना ॥ ६० ॥ युवनाश्वेन च तथा शिबिनौशीनरेण च । मुचुकुन्देन मान्धात्रा हरिश्चन्द्रेण वा विभो ॥ ६१ ॥