महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1020, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपड़ता है ॥ २१ ॥ नात्मनोऽस्ति प्रियतरः पृथिवीमनुसृत्य ह । तस्मात् प्राणिषु सर्वेषु दयावानात्मवान् भवेत् ॥ २२ ॥ इस भूमण्डलपर अपने आत्मासे बढ़कर कोई प्रिय वस्तु नहीं है। इसलिये सब प्राणियोंपर दया करे और सबको अपना आत्मा ही समझे ॥ २२ ॥ सर्वमांसानि यो राजन् यावज्जीवं न भक्षयेत् । स्वर्गे स विपुलं स्थानं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ २३ ॥ राजन्! जो जीवनभर किसी भी प्राणीका मांस नहीं खाता, वह स्वर्गमें श्रेष्ठ एवं विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥ ये भक्षयन्ति मांसानि भूतानां जीवितेषिणाम् । भक्ष्यन्ते तेऽपि भूतैस्तैरिति मे नास्ति संशयः ॥ २४ ॥ जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंके मांसको खाते हैं, वे दूसरे जन्ममें उन्हीं प्राणियोंद्वारा भक्षण किये जाते हैं। इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ॥ २४ ॥ मां स भक्षयते यस्माद् भक्षयिष्ये तमप्यहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वमनुबुद्ध्यस्व भारत ॥ २५ ॥ भरतनन्दन! (जिसका वध किया जाता है, वह प्राणी कहता है—) 'मां स भक्षयते यस्माद् भक्षयिष्ये तमप्यहम् ।' अर्थात् 'आज मुझे वह खाता है तो कभी मैं भी उसे खाऊँगा।' यही मांसका मांसत्व है—इसे ही मांस शब्दका तात्पर्य समझो ॥ २५ ॥ घातको वध्यते नित्यं तथा वध्यति भक्षिता । आक्रोष्टा क्रुध्यते राजंस्तथा द्वेष्यत्वमाप्नुते ॥ २६ ॥ राजन्! इस जन्ममें जिस जीवकी हिंसा होती है, वह दूसरे जन्ममें सदा ही अपने घातकका वध करता है। फिर भक्षण करनेवालेको भी मार डालता है। जो दूसरोंकी निन्दा करता है, वह स्वयं भी दूसरोंके क्रोध और द्वेषका पात्र होता है ॥ २६ ॥ येन येन शरीरेण यद् यत् कर्म करोति यः । तेन तेन शरीरेण तत्तत् फलमुपाश्नुते ॥ २७ ॥ जो जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, वह उस-उस शरीरसे भी उस-उस कर्मका फल भोगता है ॥ २७ ॥ अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः । अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥ २८ ॥ अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम संयम है, अहिंसा परम दान है और अहिंसा परम तपस्या है ॥ अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् । अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥ २९ ॥