भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1021, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1021

अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा परम फल है, अहिंसा परम मित्र है और अहिंसा परम सुख है ।। २९ ।। सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम् । सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ।। ३० ।। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो दान किया जाता है, समस्त तीर्थोंमें जो गोता लगाया जाता है तथा सम्पूर्ण दानोंका जो फल है—यह सब मिलकर भी अहिंसाके बराबर नहीं हो सकता ।। ३० ।। अहिंस्रस्य तपोऽक्षय्यमहिंस्रो यजते सदा । अहिंस्रः सर्वभूतानां यथा माता यथा पिता ।। ३१ ।। जो हिंसा नहीं करता, उसकी तपस्या अक्षय होती है। वह सदा यज्ञ करनेका फल पाता है। हिंसा न करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंके माता-पिताके समान है ।। ३१ ।। एतत् फलमहिंसाया भूयश्च कुरुपुंगव । न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ।। ३२ ।। कुरुश्रेष्ठ! यह अहिंसाका फल है। यही क्या, अहिंसाका तो इससे भी अधिक फल है। अहिंसासे होनेवाले लाभोंका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अहिंसाफलकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्म पर्वमें अहिंसाके फलका वर्णनविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११६ ।।