महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्तः प्रत्युवाच शृगालो वानरं तदा ।
ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम् ॥ १२ ॥
तत्कृते पापकीं योनिमापन्नोऽस्मि प्लवङ्गम ।
तस्मादेवंविधं भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षितः ॥ १३ ॥
वानरके इस प्रकार पूछनेपर सियारने उसे उत्तर दिया—‘भाई वानर! मैंने ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके वह वस्तु उसे नहीं दी थी। इसीके कारण मैं इस पापयोनिमें आ पड़ा हूँ और उसी पापसे भूखा होनेपर मुझे इस तरहका घृणित भोजन करना पड़ता है’ ॥ १२-१३ ॥
भीष्म उवाच
शृगालो वानरं प्राह पुनरेव नरोत्तम ।
किं त्वया पातकं कर्म कृतं येनासि वानरः ॥ १४ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इसके बाद सियारने वानरसे पुनः पूछा—‘तुमने कौन-सा पाप किया था? जिससे वानर हो गये?’ ॥ १४ ॥
वानर उवाच
सदा चाहं फलाहारो ब्राह्मणानां प्लवङ्गमः ।