महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मान्न ब्राह्मणस्वं तु हर्तव्यं विदुषा सदा । समं विवादो मोक्तव्यो दातव्यं स प्रतिश्रुतम् ॥ १५ ॥ **वानरने कहा—**मैं सदा ब्राह्मणोंका फल चुराकर खाया करता था; इसी पापसे वानर हुआ। अतः विज्ञ पुरुषको कभी ब्राह्मणका धन नहीं चुराना चाहिये। उनके साथ कभी झगड़ा नहीं करना चाहिये और उनके लिये जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की गयी हो, वह अवश्य दे देनी चाहिये ॥ १५ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतद् ब्रुवतो राजन् ब्राह्मणस्य मया श्रुतम् । कथां कथयतः पुण्यां धर्मज्ञस्य पुरातनीम् ॥ १६ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह कथा मैंने एक धर्मज्ञ ब्राह्मणके मुखसे सुनी है; जो प्राचीनकालकी पवित्र कथाएँ सुनाता था ॥ १६ ॥ श्रुतश्चापि मया भूयः कृष्णस्यापि विशाम्पते । कथां कथयतः पूर्वं ब्राह्मणं प्रति पाण्डव ॥ १७ ॥ प्रजानाथ! पाण्डुनन्दन! फिर मैंने यही बात भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भी सुनी थी; जब कि वे पहले किसी ब्राह्मणसे ऐसी ही कथा कह रहे थे ॥ १७ ॥ न हर्तव्यं विप्रधनं क्षन्तव्यं तेषु नित्यशः । बालाश्च नावमन्तव्या दरिद्राः कृपणा अपि ॥ १८ ॥ ब्राह्मणका धन कभी नहीं चुराना चाहिये। वे अपराध करें तो भी सदा उनके प्रति क्षमाभाव ही रखना चाहिये। वे बालक, दरिद्र अथवा दीन हों तो भी उनका अनादर नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥ एवमेव च मां नित्यं ब्राह्मणाः संदिशन्ति वै । प्रतिश्रुत्य भवेद् देयं नाशा कार्या द्विजोत्तमे ॥ १९ ॥ ब्राह्मणलोग भी मुझे सदा यही उपदेश दिया करते थे कि प्रतिज्ञा कर लेनेपर वह वस्तु ब्राह्मणको दे ही देनी चाहिये। किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आशा भंग नहीं करनी चाहिये ॥ १९ ॥ ब्राह्मणो ह्याशया पूर्वं कृतया पृथिवीपते । सुसमिद्धो यथा दीप्तः पावकस्तद्विधः स्मृतः ॥ २० ॥ पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणको पहले आशा दे देनेपर वह समिधासे प्रज्वलित हुई अग्निके समान उद्दीप्त हो उठता है ॥ यं निरीक्षेत संक्रुद्ध आशया पूर्वजातया । प्रदहेच्च हि तं राजन् कक्षमक्षय्यभुग् यथा ॥ २१ ॥