भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 105

राजन्! पहलेकी लगी हुई आशा भंग होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण जिसकी ओर देख लेता है, उसे उसी प्रकार जलाकर भस्म कर डालता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ी अथवा तिनकोंके बोझको जला देती है ॥ २१ ॥ स एव हि यदा तुष्टो वचसा प्रतिनन्दति । भवत्यगदसंकाशो विषये तस्य भारत ॥ २२ ॥ भारत! वही ब्राह्मण जब आशापूर्तिसे संतुष्ट होकर वाणीद्वारा राजाका अभिनन्दन करता है—उसे आशीर्वाद देता है, तब उसके राज्यके लिये वह चिकित्सकके तुल्य हो जाता है ॥ २२ ॥ पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चैव बान्धवान् सचिवांस्तथा । पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेन पोषयेत् ॥ २३ ॥ तथा उस दाताके पुत्र-पौत्र, बन्धु-बान्धव, पशु, मन्त्री, नगर और जनपदके लिये वह शान्तिदायक बनकर उन्हें कल्याणका भागी बनाता और उन सबका पोषण करता है ॥ २३ ॥ एतद्धि परमं तेजो ब्राह्मणस्येह दृश्यते । सहस्रकिरणस्येव सवितुर्धरणीतले ॥ २४ ॥ इस पृथ्वीपर ब्राह्मणका उत्कृष्ट तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेवके समान दृष्टिगोचर होता है ॥ २४ ॥ तस्माद् दातव्यमेवेह प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिर । यदिच्छेच्छोभनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम ॥ २५ ॥ भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इसलिये जो उत्तम योनिमें जन्म लेना चाहता हो, उसे ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तु अवश्य दे डालनी चाहिये ॥ २५ ॥ ब्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो ह्यनुत्तमः । शक्यः प्राप्तुं विशेषेण दानं हि महती क्रिया ॥ २६ ॥ ब्राह्मणको दान देनेसे निश्चय ही परम उत्तम स्वर्गलोकको विशेष रूपसे प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि दान महान् पुण्यकर्म है ॥ २६ ॥ इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा । तस्माद् दानानि देयानि ब्राह्मणेभ्यो विजानता ॥ २७ ॥ इस लोकमें ब्राह्मणको दान देनेसे देवता और पितर तृप्त होते हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष ब्राह्मणको अवश्य दान दे ॥ २७ ॥ महद्धि भरतश्रेष्ठ ब्राह्मणस्तीर्थमुच्यते । वेलायां न तु कस्यांचिद् गच्छेद्विप्रो ह्यपूजितः ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मण महान् तीर्थ कहे जाते हैं; अतः वे किसी भी समय घरपर आ जायँ तो बिना सत्कार किये उन्हें नहीं जाने देना चाहिये ॥ २८ ॥