महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1039, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा
भीष्म उवाच
एवमुक्तः प्रत्युवाच मैत्रेयः कर्मपूजकः ।
अत्यन्तश्रीमति कुले जातः प्राज्ञो बहुश्रुतः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! व्यासजीके ऐसा कहनेपर कर्मपूजक मैत्रेयने जो अत्यन्त श्रीसम्पन्न कुलमें उत्पन्न हुए बहुश्रुत विद्वान् थे, उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ।।
मैत्रेय उवाच
असंशयं महाप्राज्ञ यथैवात्थ तथैव तत् ।
अनुज्ञातश्च भवता किंचिद् ब्रूयामहं विभो ॥ २ ॥
**मैत्रेय बोले—**महाप्राज्ञ! आप जैसा कहते हैं ठीक वैसी ही बात है, इसमें संशय नहीं है। प्रभो! यदि आप आज्ञा दें तो मैं कुछ कहूँ ॥ २ ॥
व्यास उवाच
यद् यदिच्छसि मैत्रेय यावद् यावद् यथा यथा ।
ब्रूहि तत्त्वं महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**महाप्राज्ञ मैत्रेय! तुम जो-जो, जितनी-जितनी और जैसी-जैसी बातें कहना चाहो, कहो। मैं तुम्हारी बातें सुनूँगा ॥ ३ ॥
मैत्रेय उवाच
निर्दोषं निर्मलं चैवं वचनं दानसंहितम् ।
विद्यातपोभ्यां हि भवान् भावितात्मा न संशयः ॥ ४ ॥
**मैत्रेय बोले—**मुने! आपने दानके सम्बन्धमें जो बातें बतायी हैं, वे दोषरहित और निर्मल हैं। इसमें संदेह नहीं कि आपने विद्या और तपस्यासे अपने अन्तःकरणको परम पवित्र बना लिया है ॥ ४ ॥
भवतो भावितात्मत्वाल्लाभोऽयं सुमहान् मम ।
भूयो बुद्ध्यानुपश्यामि सुसमृद्धतपा इव ॥ ५ ॥
आप शुद्धचित्त हैं, इसलिये आपके समागमसे मुझे यह महान् लाभ पहुँचा है। यह बात मैं समृद्धिशाली तपवाले महर्षिके समान बुद्धिसे बारंबार विचारकर प्रत्यक्ष देखता हूँ ।।
अपि नो दर्शनादेव भवतोऽभ्युदयो भवेत् ।