महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1040, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्ये भवत्प्रसादोऽयं तद्धि कर्म स्वभावतः ॥ ६ ॥ आपके दर्शनसे ही हमलोगोंका महान् अभ्युदय हो सकता है। आपने जो दर्शन दिया, यह आपकी बहुत बड़ी कृपा है। मैं ऐसा ही मानता हूँ। यह कर्म भी आपकी कृपासे ही स्वभावतः बन गया है ॥ ६ ॥
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद् ब्राह्मण्यकारणम् । त्रिभिर्गुणैः समुदितस्ततो भवति वै द्विजः ॥ ७ ॥ ब्राह्मणत्वके तीन कारण माने गये हैं—तपस्या, शास्त्रज्ञान और विशुद्ध ब्राह्मणकुलमें जन्म। जो इन तीनों गुणोंसे सम्पन्न है, वही सच्चा ब्राह्मण है ॥ ७ ॥
अस्मिंस्तृप्ते च तृप्यन्ते पितरो दैवतानि च । न हि श्रुतवतां किंचिदधिकं ब्राह्मणादृते ॥ ८ ॥ ऐसे ब्राह्मणके तृप्त होनेपर देवता और पितर भी तृप्त हो जाते हैं। विद्वानोंके लिये ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई मान्य नहीं है ॥ ८ ॥
अन्धं स्यात् तम एवेदं न प्रज्ञायेत किंचन । चातुर्वर्ण्यं न वर्तेत धर्माधर्मावृतानृते ॥ ९ ॥ यदि ब्राह्मण न हों तो यह सारा जगत् अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हो जाय। किसीको कुछ सूझ न पड़े तथा चारों वर्णोंकी स्थिति, धर्म-अधर्म और सत्यासत्य कुछ भी न रह जाय ॥ ९ ॥
यथा हि सुकृते क्षेत्रे फलं विन्दति मानवः । एवं दत्त्वा श्रुतवति फलं दाता समश्नुते ॥ १० ॥ जैसे मनुष्य अच्छी तरह जोतकर तैयार किये हुए खेतमें बीज डालनेपर उसका फल पाता है, उसी प्रकार विद्वान् ब्राह्मणको दान देकर दाता निश्चय ही उसके फलका भागी होता है ॥ १० ॥
ब्राह्मणश्चेन्न विन्देत श्रुतवृत्तोपसंहितः । प्रतिग्रहीता दानस्य मोघं स्यात् धनिनां धनम् ॥ ११ ॥ यदि विद्या और सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मण जो दान लेनेका प्रधान अधिकारी है, धन न पा सके तो धनियोंका धन व्यर्थ हो जाय ॥ ११ ॥
अदन्नविद्वान् हन्त्यन्नमद्यमानं च हन्ति तम् । तं चान्नं पाति यश्चान्नं स हन्ता हन्यतेऽबुधः ॥ १२ ॥ मूर्ख मनुष्य यदि किसीका अन्न खाता है तो वह उस अन्नको नष्ट करता है (अर्थात् कर्ताको उसका कुछ फल नहीं मिलता)। इसी प्रकार वह अन्न भी उस मूर्खको नष्ट कर डालता है। जो सुपात्र होनेके कारण अन्न और दाताकी रक्षा करता है, उसकी भी वह अन्न रक्षा करता है। जो मूर्ख दानके फलका हनन करता है, वह स्वयं भी मारा जाता है ॥ १२ ॥
प्रभुर्ह्यन्नमदन् विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः ।