महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1041, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस चान्नाज्जायते तस्मात् सूक्ष्म एष व्यतिक्रमः ॥ १३ ॥ प्रभाव और शक्तिसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण यदि अन्न भोजन करता है तो वह पुनः अन्नका उत्पादन करता है, किंतु वह स्वयं अन्नसे उत्पन्न होता है, इसलिये यह व्यतिक्रम सूक्ष्म (दुर्विज्ञेय) है अर्थात् यद्यपि वृष्टिसे अन्नकी और अन्नसे प्रजाकी उत्पत्ति होती है; किंतु यह प्रजा (विद्वान् ब्राह्मण) से अन्नकी उत्पत्तिका विषय दुर्विज्ञेय है ॥ १३ ॥
यदेव ददतः पुण्यं तदेव प्रतिगृह्णतः । न ह्येकचक्रं वर्तेत इत्येवमृषयो विदुः ॥ १४ ॥ ‘दान देनेवालेको जो पुण्य होता है, वही दान लेनेवालेको भी (यदि वह योग्य अधिकारी है तो) होता है। (क्योंकि दोनों एक दूसरेके उपकारक होते हैं) एक पहियेसे गाड़ी नहीं चलती—प्रतिग्रहीताके बिना दाताका दान सफल नहीं हो सकता।’ ऐसी ऋषियोंकी मान्यता है ॥
यत्र वै ब्राह्मणाः सन्ति श्रुतवृत्तोपसंहिताः । तत्र दानफलं पुण्यमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ १५ ॥ जहाँ विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण रहते हैं, वहीं दिये हुए दानका फल इहलोक और परलोकमें मनुष्य भोगता है ॥ १५ ॥
ये योनिशुद्धाः सततं तपस्यभिरता भृशम् । दानाध्ययनसम्पन्नास्ते वै पूज्यतमाः सदा ॥ १६ ॥ जो ब्राह्मण विशुद्ध कुलमें उत्पन्न, निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले, बहुत दानपरायण तथा अध्ययनसम्पन्न हैं, वे ही सदा पूज्य माने गये हैं ॥ १६ ॥
तैर्हि सद्भिः कृतः पन्थास्तेन यातो न मुह्यते । ते हि स्वर्गस्य नेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ॥ १७ ॥ ऐसे सत्पुरुषोंने जिस मार्गका निर्माण किया है, उससे चलनेवालेको कभी मोह नहीं होता; क्योंकि वे मनुष्योंको स्वर्गलोकमें ले जानेवाले तथा सनातन यज्ञनिर्वाहक हैं ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायामेकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥