महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1043, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वमेतदवाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥ ‘जो कोई भी उद्देश्य लेकर पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त होता है, वह सब उसे तप और विद्यासे प्राप्त हो जाता है; यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ७ ॥
दुरन्वयं दुष्प्रधर्षं दुरापं दुरतिक्रमम् । सर्वं वै तपसाभ्येति तपो हि बलवत्तरम् ॥ ८ ॥ ‘जिससे सम्बन्ध स्थापित करना अत्यन्त कठिन है, जो दुर्धर्ष, दुर्लभ और दुर्लङ्घ्य है, वह सब तपस्यासे सुलभ हो जाता है; क्योंकि तपस्याका बल सबसे बड़ा है ॥ ८ ॥
सुरापोऽसम्मत्यादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः । तपसा तरते सर्वमेनस्खं प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ ‘शराबी, चोर, गर्भहत्यारा, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला पापी भी तपस्याद्वारा सम्पूर्ण संसारसे पार हो जाता है और अपने पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
सर्वविद्यस्तु चक्षुष्मानपि यादृशतादृशम् । तपस्विनं तथैवाहुस्ताभ्यां कार्यं सदा नमः ॥ १० ॥ ‘जो सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण है, वही नेत्रवान् है और तपस्वी, चाहे जैसा हो उसे भी नेत्रवान् ही कहा जाता है। इन दोनोंको सदा नमस्कार करना चाहिये ॥
सर्वे पूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः । दानप्रदाः सुखं प्रेत्य प्राप्नुवन्तीह च श्रियम् ॥ ११ ॥ ‘जो विद्याके धनी और तपस्वी हैं, वे सब पूजनीय हैं तथा दान देनेवाले भी इस लोकमें धन-सम्पत्ति और परलोकमें सुख पाते हैं ॥ ११ ॥
इमं च ब्रह्मलोकं च लोकं च बलवत्तरम् । अन्नदानैः सुकृतिनः प्रतिपद्यन्ति लौकिकाः ॥ १२ ॥ संसारके पुण्यात्मा पुरुष अन्न-दान देकर इस लोकमें भी सुखी होते हैं और मृत्युके बाद ब्रह्मलोक तथा दूसरे शक्तिशाली लोकको प्राप्त कर लेते हैं ॥
पूजिताः पूजयन्त्येते मानिता मानयन्ति च । स दाता यत्र यत्रैति सर्वतः सम्प्रणूयते ॥ १३ ॥ ‘दानी स्वयं पूजित और सम्मानित होकर दूसरोंका पूजन और सम्मान करते हैं। दाता जहाँ-जहाँ जाते हैं, सब ओर उनकी स्तुति की जाती है ॥ १३ ॥
अकर्ता चैव कर्ता च लभते यस्य यादृशम् । यदि चोर्ध्वं यद्यधो वा स्वाँल्लोकानभियास्यति ॥ १४ ॥ ‘मनुष्य दान करता हो या न करता हो, वह ऊपरके लोकमें रहता हो या नीचेके लोकमें, जिसे कर्मानुसार जैसा लोक प्राप्त होगा, वह अपने उसी लोकमें जायगा ॥
प्राप्स्यसि त्वन्नपानानि यानि वाञ्छसि कानिचित् । मेधाव्यसि कुले जातः श्रुतवाननृशंसवान् ॥ १५ ॥