महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सर्वमेतदवाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥ ‘जो कोई भी उद्देश्य लेकर पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त होता है, वह सब उसे तप और विद्यासे प्राप्त हो जाता है; यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ७ ॥
दुरन्वयं दुष्प्रधर्षं दुरापं दुरतिक्रमम् । सर्वं वै तपसाभ्येति तपो हि बलवत्तरम् ॥ ८ ॥ ‘जिससे सम्बन्ध स्थापित करना अत्यन्त कठिन है, जो दुर्धर्ष, दुर्लभ और दुर्लङ्घ्य है, वह सब तपस्यासे सुलभ हो जाता है; क्योंकि तपस्याका बल सबसे बड़ा है ॥ ८ ॥
सुरापोऽसम्मत्यादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः । तपसा तरते सर्वमेनस्खं प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ ‘शराबी, चोर, गर्भहत्यारा, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला पापी भी तपस्याद्वारा सम्पूर्ण संसारसे पार हो जाता है और अपने पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
सर्वविद्यस्तु चक्षुष्मानपि यादृशतादृशम् । तपस्विनं तथैवाहुस्ताभ्यां कार्यं सदा नमः ॥ १० ॥ ‘जो सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण है, वही नेत्रवान् है और तपस्वी, चाहे जैसा हो उसे भी नेत्रवान् ही कहा जाता है। इन दोनोंको सदा नमस्कार करना चाहिये ॥
सर्वे पूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः । दानप्रदाः सुखं प्रेत्य प्राप्नुवन्तीह च श्रियम् ॥ ११ ॥ ‘जो विद्याके धनी और तपस्वी हैं, वे सब पूजनीय हैं तथा दान देनेवाले भी इस लोकमें धन-सम्पत्ति और परलोकमें सुख पाते हैं ॥ ११ ॥
इमं च ब्रह्मलोकं च लोकं च बलवत्तरम् । अन्नदानैः सुकृतिनः प्रतिपद्यन्ति लौकिकाः ॥ १२ ॥ संसारके पुण्यात्मा पुरुष अन्न-दान देकर इस लोकमें भी सुखी होते हैं और मृत्युके बाद ब्रह्मलोक तथा दूसरे शक्तिशाली लोकको प्राप्त कर लेते हैं ॥
पूजिताः पूजयन्त्येते मानिता मानयन्ति च । स दाता यत्र यत्रैति सर्वतः सम्प्रणूयते ॥ १३ ॥ ‘दानी स्वयं पूजित और सम्मानित होकर दूसरोंका पूजन और सम्मान करते हैं। दाता जहाँ-जहाँ जाते हैं, सब ओर उनकी स्तुति की जाती है ॥ १३ ॥
अकर्ता चैव कर्ता च लभते यस्य यादृशम् । यदि चोर्ध्वं यद्यधो वा स्वाँल्लोकानभियास्यति ॥ १४ ॥ ‘मनुष्य दान करता हो या न करता हो, वह ऊपरके लोकमें रहता हो या नीचेके लोकमें, जिसे कर्मानुसार जैसा लोक प्राप्त होगा, वह अपने उसी लोकमें जायगा ॥
प्राप्स्यसि त्वन्नपानानि यानि वाञ्छसि कानिचित् । मेधाव्यसि कुले जातः श्रुतवाननृशंसवान् ॥ १५ ॥
कौमारचारी व्रतवान् मैत्रेय निरतो भव ।
एतद् गृहाण प्रथमं प्रशस्तं गृहमेधिनाम् ॥ १६ ॥
‘मैत्रेयजी! तुम जो कुछ चाहोगे, उसके अनुसार तुमको अन्न-पानकी सामग्री प्राप्त होगी। तुम बुद्धिमान्, कुलीन, शास्त्रज्ञ और दयालु हो। तुम्हारी तरुण अवस्था है और तुम व्रतधारी हो। अतः सदा धर्म-पालनमें लगे रहो और गृहस्थोंके लिये जो सबसे उत्तम एवं मुख्य कर्तव्य है, उसे ग्रहण करो—ध्यान देकर सुनो ।।
यो भर्ता वासितातुष्टो भर्तुस्तुष्टा च वासिता ।
यस्मिन्नेवं कुले सर्वं कल्याणं तत्र वर्तते ॥ १७ ॥
‘जिस कुलमें पति अपनी पत्नीसे और पत्नी अपने पतिसे संतुष्ट रहती हो, वहाँ सदा कल्याण होता है ।।
अद्भिर्गात्रान्मलमिव तमोऽग्निप्रभया यथा ।
दानेन तपसा चैव सर्वपापमपोहति ॥ १८ ॥
‘जिस प्रकार जलसे शरीरका मल धुल जाता है और अग्निकी प्रभासे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार दान और तपस्यासे मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।। १८ ।।
(दानेन तपसा चैव विष्णोरभ्यर्चनेन च ।
ब्राह्मणः स महाभाग तरेत् संसारसागरात् ॥
स्वकर्मशुद्धसत्त्वानां तपोभिर्निर्मलात्मनाम् ।
विद्यया गतमोहानां तारणाय हरिः स्मृतः ॥
तदर्चनपरो नित्यं तद्भक्तस्तं नमस्कुरु ।
तद्भक्ता न विनश्यन्ति ह्यष्टाक्षरपरायणाः ॥
प्रणवोपासनपराः परमार्थपरास्त्विह ।
एतैः पावय चात्मानं सर्वपापमपोह्य च ॥)
‘महाभाग! ब्राह्मण दान, तपस्या और भगवान् विष्णुकी आराधनाके द्वारा संसारसागरसे पार हो जाता है। जिन्होंने अपने वर्णोचित कर्मोंका अनुष्ठान करके अन्तःकरणको शुद्ध बना लिया है, तपस्याद्वारा जिनका चित्त निर्मल हो गया है तथा विद्याके प्रभावसे जिनका मोह दूर हो गया है, ऐसे मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् श्रीहरि माने गये हैं अर्थात् उनका स्मरण करते ही वे अवश्य उद्धार करते हैं। अतः तुम भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर हो सदा उनके भक्त बने रहो और निरन्तर उन्हें नमस्कार करो। अष्टाक्षर मन्त्रके जपमें तत्पर रहनेवाले भगवद्भक्त कभी नष्ट नहीं होते। जो इस जगत्में प्रणवोपासनामें संलग्न और परमार्थ-साधनमें तत्पर हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके संगसे सारा पाप दूर करके अपने आपको पवित्र करो ।।
स्वस्ति प्राप्नुहि मैत्रेय गृहान् साधु व्रजाम्यहम् ।
एतन्मनसि कर्तव्यं श्रेय एवं भविष्यति ॥ १९ ॥
‘मैत्रेय! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं सावधानीके साथ अपने आश्रमको जा रहा हूँ। मैंने जो कुछ बताया है, उसे याद रखना; इससे तुम्हारा कल्याण होगा’ ॥ १९ ॥
तं प्रणम्याथ मैत्रेयः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
स्वस्ति प्राप्नोतु भगवानित्युवाच कृताञ्जलिः ॥ २० ॥
तब मैत्रेयजीने व्यासजीको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! आप मंगल प्राप्त करें’ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर २४ श्लोक हैं)
शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
सत्स्त्रीणां समुदाचारं सर्वधर्मविदां वर ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ पितामह! साध्वी स्त्रियोंके सदाचारका क्या स्वरूप है? यह मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। उसे मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वज्ञां सर्वतत्त्वज्ञां देवलोके मनस्विनीम् ।
कैकेयी सुमना नाम शाण्डिलीं पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! देवलोककी बात है—सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली सर्वज्ञा एवं मनस्विनी शाण्डिलीदेवीसे केकयराजकी पुत्री सुमनाने इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ २ ॥
केन वृत्तेन कल्याणि समाचारेण केन वा ।
विधूय सर्वपापानि देवलोकं त्वमागता ॥ ३ ॥
‘कल्याणि! तुमने किस बर्ताव अथवा किस सदाचारके प्रभावसे समस्त पापोंका नाश करके देवलोकमें पदार्पण किया है? ॥ ३ ॥
हुताशनशिखेव त्वं ज्वलमाना स्वतेजसा ।
सुता ताराधिपस्येव प्रभया दिवमागता ॥ ४ ॥
‘तुम अपने तेजसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रज्वलित हो रही हो और चन्द्रमाकी पुत्रीके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होती हुई स्वर्ग-लोकमें आयी हो ॥ ४ ॥
अरजांसि च वस्त्राणि धारयन्ती गतक्लमा ।
विमानस्था शुभा भासि सहस्रगुणमोजसा ॥ ५ ॥
निर्मल वस्त्र धारण किये थकावट और परिश्रमसे रहित होकर विमानपर बैठी हो। तुम्हारी मंगलमयी आकृति है, तुम अपने तेजसे सहस्रगुणी शोभा पा रही हो ॥ ५ ॥
न त्वमल्पेन तपसा दानेन नियमेन वा ।
इमं लोकमनुप्राप्ता त्वं हि तत्त्वं वदस्व मे ॥ ६ ॥
‘थोड़ी-सी तपस्या थोड़े-से दान या छोटे-मोटे नियमोंका पालन करके तुम इस लोकमें नहीं आयी हो। अतः अपनी साधनाके सम्बन्धमें सच्ची-सच्ची बात बताओ’ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1047)
देवलोकमें पतिव्रता शाण्डिली और सुमनाकी बातचीत
इति पृष्टा सुमनया मधुरं चारुहासिनी । शाण्डिली निभृतं वाक्यं सुमनामिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥ सुमनाके इस प्रकार मधुर वाणीमें पूछनेपर मनोहर मुसकानवाली शाण्डिलीने उससे नम्रतापूर्ण शब्दोंमें इस प्रकार कहा— ॥ ७ ॥ नाहं काषायवसना नापि वल्कलधारिणी । न च मुण्डा च जटिला भूत्वा देवत्वमागता ॥ ८ ॥ ‘देवि! मैंने गेरुआ वस्त्र नहीं धारण किया, वल्कलवस्त्र नहीं पहना, मूँड़ नहीं मुड़ाया और बड़ी-बड़ी जटाएँ नहीं रखायीं। वह सब करके मैं देवलोकमें नहीं आयी हूँ ॥ ८ ॥ अहितानि च वाक्यानि सर्वाणि परुषाणि च । अप्रमत्ता च भर्तारं कदाचिन्नाहमब्रुवम् ॥ ९ ॥ ‘मैंने सदा सावधान रहकर अपने पतिदेवके प्रति मुँहसे कभी अहितकर और कठोर वचन नहीं निकाले हैं ॥ ९ ॥ देवतानां पितॄणां च ब्राह्मणानां च पूजने । अप्रमत्ता सदा युक्ता श्वश्रूश्वशुरवर्तिनी ॥ १० ॥ ‘मैं सदा सास-ससुरकी आज्ञामें रहती और देवता, पितर तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें सदा सावधान होकर संलग्न रहती थी ॥ १० ॥ पैशुन्ये न प्रवर्तामि न ममैतन्मनोगतम् । अद्द्वारि न च तिष्ठामि चिरं न कथयामि च ॥ ११ ॥ ‘किसीकी चुगली नहीं खाती थी। चुगली करना मेरे मनको बिलकुल नहीं भाता था। मैं घरका दरवाजा छोड़कर अन्यत्र नहीं खड़ी होती और देरतक किसीसे बात नहीं करती थी ॥ ११ ॥ असद् वा हसितं किंचिदहितं वापि कर्मणा । रहस्यमरहस्यं वा न प्रवर्तामि सर्वथा ॥ १२ ॥ ‘मैंने कभी एकान्तमें या सबके सामने किसीके साथ अश्लील परिहास नहीं किया तथा मेरी किसी क्रियाद्वारा किसीका अहित भी नहीं हुआ। मैं ऐसे कार्योंमें कभी प्रवृत्त नहीं होती थी ॥ १२ ॥ कार्यार्थे निर्गतं चापि भर्तारं गृहमागतम् । आसनेनोपसंयोज्य पूजयामि समाहिता ॥ १३ ॥ ‘यदि मेरे स्वामी किसी कार्यसे बाहर जाकर फिर घरको लौटते तो मैं उठकर उन्हें बैठनेके लिये आसन देती और एकाग्रचित्त हो उनकी पूजा करती थी ॥ १३ ॥ यदन्नं नाभिजानाति यद् भोज्यं नाभिनन्दति । भक्ष्यं वा यदि वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जयाम्यहम् ॥ १४ ॥
'मेरे स्वामी जिस अन्नको ग्रहण करने योग्य नहीं समझते थे तथा जिस भक्ष्य, भोज्य या लेह्य आदिको वे नहीं पसंद करते थे, उन सबको मैं भी त्याग देती थी ॥ १४ ॥
कुटुम्बार्थे समानीतं यत्किंचित् कार्यमेव तु ।
प्रातरुत्थाय तत्सर्वं कारयामि करोमि च ॥ १५ ॥
'सारे कुटुम्बके लिये जो कुछ कार्य आ पड़ता, वह सब मैं सबेरे ही उठकर कर-करा लेती थी ॥ १५ ॥
(अग्निसंरक्षणपरा गृहशुद्धिं च कारये ।
कुमारान् पालये नित्यं कुमारीं परिशिक्षये ॥
आत्मप्रियाणि हित्वापि गर्भसंरक्षणे रता ।
बालानां वर्जये नित्यं शापं कोपं प्रतापनम् ॥
अविक्षिप्तानि धान्यानि नान्नविक्षेपणं गृहे ।
रत्नवत् स्पृहये गेहे गावः सयवसोदकाः ॥
समुद्गम्य च शुद्धाहं भिक्षां दद्यां द्विजातिषु ।)
'मैं अग्निहोत्रकी रक्षा करती और घरको लीप-पोतकर शुद्ध रखती थी। बच्चोंका प्रतिदिन पालन करती और कन्याओंको नारीधर्मकी शिक्षा देती थी। अपनेको प्रिय लगनेवाली खाद्य वस्तुएँ त्यागकर भी गर्भकी रक्षामें ही सदा संलग्न रहती थी। बच्चोंको शाप (गाली) देना, उनपर क्रोध करना अथवा उन्हें सताना आदि मैं सदाके लिये त्याग चुकी थी। मेरे घरमें कभी अनाज छींटे नहीं जाते थे। किसी भी अन्नको बिखेरा नहीं जाता था। मैं अपने घरमें गौओंको घास-भूसा खिलाकर, पानी पिलाकर तृप्त करती थी और रत्नकी भाँति उन्हें सुरक्षित रखनेकी इच्छा करती थी तथा शुद्ध अवस्थामें मैं आगे बढ़कर ब्राह्मणोंको भिक्षा देती थी ॥
प्रवासं यदि मे याति भर्ता कार्येण केनचित् ।
मंगलैर्बहुभिर्युक्ता भवामि नियता तदा ॥ १६ ॥
यदि मेरे पति किसी आवश्यक कार्यवश कभी परदेश जाते तो मैं नियमसे रहकर उनके कल्याणके लिये नाना प्रकारके मांगलिक कार्य किया करती थी ॥
अञ्जनं रोचनां चैव स्नानं माल्यानुलेपनम् ।
प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नाभिनन्दामि भर्तरि ॥ १७ ॥
'स्वामीके बाहर चले जानेपर मैं आँखोंमें आँजन लगाना, ललाटमें गोरोचनका तिलक करना, तैलाभ्यंगपूर्वक स्नान करना, फूलोंकी माला पहनना, अंगोंमें अंगराग लगाना तथा शृंगार करना पसंद नहीं करती थी ॥ १७ ॥
नोत्थापयामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा ।
आन्तरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मनः ॥ १८ ॥
‘जब स्वामी सुखपूर्वक सो जाते उस समय आवश्यक कार्य आ जानेपर भी मैं उन्हें कभी नहीं जगाती थी। इससे मेरे मनको विशेष संतोष प्राप्त होता था ॥
नायासयामि भर्तारं कुटुम्बार्थेऽपि सर्वदा ।
गुप्तगुह्या सदा चास्मि सुसम्मूष्टनिवेशना ॥ १९ ॥
‘परिवारके पालन-पोषणके कार्यके लिये भी मैं उन्हें कभी नहीं तंग करती थी। घरकी गुप्त बातोंको सदा छिपाये रखती और घर-आँगनको सदा झाड़-बुहारकर साफ रखती थी ॥ १९ ॥
इमं धर्मपथं नारी पालयन्ती समाहिता ।
अरुन्धतीव नारीणां स्वर्गलोके महीयते ॥ २० ॥
‘जो स्त्री सदा सावधान रहकर इस धर्ममार्गका पालन करती है, वह नारियोंमें अरुन्धतीके समान आदरणीय होती है और स्वर्गलोकमें भी उसकी विशेष प्रतिष्ठा होती है’ ॥ २० ॥
भीष्म उवाच
एतदाख्याय सा देवी सुमनायै तपस्विनी ।
पतिधर्मं महाभागा जगामादर्शनं तदा ॥ २१ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! सुमनाको इस प्रकार पातिव्रत्य धर्मका उपदेश देकर तपस्विनी महाभागा शाण्डिली देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं ॥ २१ ॥
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत् पर्वणि पर्वणि ।
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने स सुखी वसेत् ॥ २२ ॥
पाण्डुनन्दन! जो प्रत्येक पर्वके दिन इस आख्यानका पाठ करता है, वह देवलोकमें पहुँचकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शाण्डिलीसुमनासंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और सुमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं)
युधिष्ठिरने कहा—पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका स
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना
(युधिष्ठिर उवाच
यज्ज्ञेयं परमं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः ।
सारं मे सर्वशास्त्राणां वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है, उस श्रेयका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये ।।
भीष्म उवाच
श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम् ।
श्रोतव्यं च त्वया सम्यग् ज्ञातव्यं च विशाम्पते ॥
**भीष्मजीने कहा—**प्रजानाथ! जो अत्यन्त गूढ़, संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाला और तुम्हारे द्वारा श्रवण करने एवं भलीभाँति जाननेके योग्य है, उस परम श्रेयका वर्णन सुनो ।।
पुण्डरीकः पुरा विप्रः पुण्यतीर्थे जपान्वितः ।
नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम् ॥
नारदश्चाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्तं महात्मना ॥
प्राचीन कालकी बात है, पुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण किसी पुण्यतीर्थमें सदा जप किया करते थे। उन्होंने योगपरायण मुनिवर नारदजीसे श्रेय (कल्याणकारी साधन) के विषयमें पूछा। तब नारदजीने महात्मा ब्रह्माजीके द्वारा बताये हुए श्रेयका उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया ।।
नारद उवाच
शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् ।
अप्रभूतं प्रभूतार्थं वेदशास्त्रार्थसारकम् ॥
**नारदजीने कहा—**तात! तुम सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका वर्णन सुनो। यह किसी व्यक्ति-विशेषसे नहीं प्रकट हुआ है—अनादि है, प्रचुर अर्थका साधक है तथा वेदों और शास्त्रोंके अर्थका सारभूत है ।।
यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः ।
स एव सर्वभूतात्मा नर इत्यभिधीयते ॥
जो चौबीस तत्त्वमयी प्रकृतिसे उसका साक्षिभूत पचीसवाँ तत्त्व पुरुष कहा गया है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, उसीको नर कहते हैं ।।
नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः ।
तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥
नरसे सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट हुए हैं, इसलिये उन्हें नार कहते हैं। नार ही भगवान्का अयन—निवासस्थान है, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं ।।
नारायणाज्जगत् सर्वं सर्गकाले प्रजायते ।
तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥
सृष्टिकालमें यह सारा जगत् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयकालमें फिर उन्हींमें इसका लय होता है ।।
नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
परादपि परश्चासौ तस्मान्नास्ति परात् परम् ॥
नारायण ही परब्रह्म हैं, परमपुरुष नारायण ही सम्पूर्ण तत्त्व हैं, वे ही परसे भी परे हैं। उनके सिवा दूसरा कोई परात्पर तत्त्व नहीं है ।।
वासुदेवं तथा विष्णुमात्मानं च तथा विदुः ।
संज्ञाभेदैः स एवैकः सर्वशास्त्राभिसंस्कृतः ॥
उन्हींको वासुदेव, विष्णु तथा आत्मा कहते हैं। संज्ञाभेदसे एकमात्र नारायण ही सम्पूर्ण शास्त्रोंद्वारा वर्णित होते हैं ।।
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥
समस्त शास्त्रोंका आलोडन करके बारंबार विचार करनेपर एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर हुआ है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये ।।
तस्मात्त्वं गहनान् सर्वांस्त्यक्त्वा शास्त्रार्थविस्तरान् ।
अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमजं विभुम् ॥
अतः तुम शास्त्रार्थके सम्पूर्ण गहन विस्तारका त्याग करके अनन्यचित्त होकर सर्वव्यापी अजन्मा भगवान् नारायणका ध्यान करो ।।
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः ।
सोऽपि सद्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः ॥
जो आलस्य छोड़कर दो घड़ी भी नारायणका ध्यान करता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है। फिर जो निरन्तर उन्हींके भजन-ध्यानमें तत्पर रहता है, उसकी तो बात ही क्या है ।।
नमो नारायणायेति यो वेद ब्रह्म शाश्वतम् ।
अन्तकाले जपन्नेति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
जो 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर मन्त्रको सनातन ब्रह्मरूप जानता है और अन्तकालमें इसका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥
श्रवणान्मननाच्चैव गीतिस्तुत्यर्चनादिभिः ।
आराध्यं सर्वदा ब्रह्म पुरुषेण हितैषिणा ॥
जो मनुष्य अपना हित चाहता हो, वह सदा श्रवण, मनन, गीत, स्तुति और पूजन आदिके द्वारा सर्वदा ब्रह्मस्वरूप नारायणकी आराधना करे ॥
लिप्यते न स पापेन नारायणपरायणः ।
पुनाति सकलं लोकं सहस्रांशुरिवोदितः ॥
नारायणके भजनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता। वह उदित हुए सहस्र किरणोंवाले सूर्यकी भाँति समस्त लोकको पवित्र कर देता है ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।
केशवाराधनं हित्वा नैव यान्ति परां गतिम् ॥
ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, भगवान् विष्णुकी आराधना छोड़ देनेपर ये कोई भी परम गतिको नहीं प्राप्त होते हैं ॥
जन्मान्तरसहस्रेषु दुर्लभा तद्गता मतिः ।
तद्भक्तवत्सलं देवं समाराधय सुव्रत ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुण्डरीक! सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी भगवान् विष्णुमें मन और बुद्धिका लगना अत्यन्त दुर्लभ है। अतः तुम उन भक्तवत्सल नारायणदेवकी भलीभाँति आराधना करो ॥
भीष्म उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु स विप्रोऽभ्यर्चयद्धरिम् ।
स्वप्नेऽपि पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
किरीटकुण्डलधरं लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभम् ।
तं दृष्ट्वा देवदेवेशं प्राणमत् सम्भ्रमान्वितः ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर विप्रवर पुण्डरीक भगवान् श्रीहरिकी आराधना करने लगे। वे स्वप्नमें भी शंख-चक्र गदाधारी, किरीट और कुण्डलसे सुशोभित, सुन्दर श्रीवत्स-चिह्न एवं कौस्तुभमणि धारण करनेवाले कमलनयन नारायण देवका दर्शन करते थे और उन देवदेवेश्वरको देखते ही बड़े वेगसे उठकर उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करते थे ॥
अथ कालेन महता तथा प्रत्यक्षतां गतः ।
संस्तुतः स्तुतिभिर्वेदैर्देवगन्धर्वकिन्नरैः ॥
तदनन्तर दीर्घकालके बाद भगवान्ने उसी रूपमें पुण्डरीकको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय सम्पूर्ण वेद तथा देवता, गन्धर्व और किन्नर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते थे ।।
अथ तेनैव भगवानात्मलोकमधोक्षजः ।
गतः सम्पूजितः सर्वैः स योगनिलयो हरिः ॥
योग ही जिनका निवासस्थान है, वे भगवान् अधोक्षज श्रीहरि सबके द्वारा पूजित हो उस भक्त पुण्डरीकको साथ लेकर ही पुनः अपने धामको चले गये ।।
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तद्भक्तस्तत्परायणः ।
अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम् ॥
राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भगवान्के भक्त एवं शरणागत होकर उनकी यथायोग्य पूजा करके उन्हीं पुरुषोत्तमके भजनमें लगे रहो ।।
अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं
सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।
निरुपममुपमेयं योगिविज्ञानगम्यं
त्रिभुवनगुरुमीशं सम्प्रपद्यस्व विष्णुम् ॥)
जो अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्येय, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, उपमाके योग्य तथा योगियोंके लिये ज्ञान-गम्य हैं, उन त्रिभुवनगुरु भगवान् विष्णुकी शरण लो ।।
युधिष्ठिर उवाच
साम्नि चापि प्रदाने च ज्यायः किं भवतो मतम् ।
प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये ।। १ ।।
भीष्म उवाच
साम्ना प्रसाद्यते कश्चिद् दानेन च तथा परः ।
पुरुषप्रकृतिं ज्ञात्वा तयोरेकतरं भजेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! कोई मनुष्य सामसे प्रसन्न होता है और कोई दानसे। अतः पुरुषके स्वभावको समझकर दोनोंमेंसे एकको अपनाना चाहिये ।। २ ।।
गुणांस्तु शृणु मे राजन् सान्त्वस्य भरतर्षभ ।
दारुणान्यपि भूतानि सान्त्वेनाराधयेद् यथा ॥ ३ ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! अब तुम सामके गुणोंको सुनो। सामके द्वारा मनुष्य भयानक-से-भयानक प्राणीको वशमें कर सकता है ॥ ३ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजातिः कानने यथा ॥ ४ ॥
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसके अनुसार कोई ब्राह्मण किसी जंगलमें किसी राक्षसके चंगुलमें फँसकर भी सामनीतिके द्वारा उससे मुक्त हो गया था ॥ ४ ॥
कश्चिद् वाग्बुद्धिसम्पन्नो ब्राह्मणो विजने वने ।
गृहीतः कृच्छ्रमापन्नो रक्षसा भक्षयिष्यता ॥ ५ ॥
एक बुद्धिमान् एवं वाचाल ब्राह्मण किसी निर्जन वनमें घूम रहा था। उसी समय किसी राक्षसने आकर उसे खानेकी इच्छासे पकड़ लिया। बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्टमें पड़ गया ॥ ५ ॥
स बुद्धिश्रुतिसम्पन्नस्तं दृष्ट्वातीव भीषणम् ।
सामैवास्मिन् प्रयुयुजे न मुमोह न विव्यथे ॥ ६ ॥
ब्राह्मणकी बुद्धि तो अच्छी थी ही, वह शास्त्रोंका विद्वान् भी था। इसलिये उस अत्यन्त भयानक राक्षसको देखकर भी वह न तो घबराया और न व्यथित ही हुआ। बल्कि उसके प्रति उसने साम नीतिका ही प्रयोग किया ॥ ६ ॥
रक्षस्तु वाचं सम्पूज्य प्रश्नं पप्रच्छ तं द्विजम् ।
मोक्ष्यसे ब्रूहि मे प्रश्नं केनास्मि हरिणः कृशः ॥ ७ ॥
राक्षसने ब्राह्मणके शान्तिमय वचनोंकी प्रशंसा करके उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया और कहा—‘यदि मेरे प्रश्नका उत्तर दे दोगे तो तुम्हें छोड़ दूँगा! बताओ, मैं किस कारणसे अत्यन्त दुर्बल और सफेद (पाण्डु) हो गया हूँ’ ॥ ७ ॥
मुहूर्तमथ संचिन्त्य ब्राह्मणस्तस्य रक्षसः ।
आभिर्गाथाभिरव्यग्रः प्रश्नं प्रतिजगाद ह ॥ ८ ॥
यह सुनकर ब्राह्मणने दो घड़ीतक विचार करके शान्तभावसे निम्नांकित गाथाओं (वचनोंद्वारा) उस राक्षसके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ८ ॥
ब्राह्मण उवाच
विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनैः ।
विषयानतुलान् भुङ्क्षे तेनासि हरिणः कृशः ॥ ९ ॥
**ब्राह्मण बोला—**राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृद्जनोंसे अलग होकर परदेशमें दूसरे लोगोंके साथ रहते और अनुपम विषयोंका उपभोग करते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो ॥ ९ ॥
नूनं मित्राणि ते रक्षः साधूपचरितान्यपि । स्वदोषादपरज्यन्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 1057)
सामनीतिकी विजय
निशाचर! तुम्हारे मित्र तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सम्मानित होनेपर भी अपने स्वभावदोषके कारण तुमसे विमुख रहते हैं; इसीलिये तुम चिन्तावश दुबले होकर सफेद पड़ते जा रहे हो ॥ १० ॥ धनैश्वर्याधिकाः स्तब्धास्त्वद्गुणैः परमावराः । अवजानन्ति नूनं त्वां तेनासि हरिणः कृशः ॥ ११ ॥ जो गुणोंमें तुम्हारी अपेक्षा निम्नश्रेणीके हैं, वे जड मनुष्य भी धन और ऐश्वर्यमें अधिक होनेके कारण निश्चय ही सदा तुम्हारी अवहेलना किया करते हैं; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद (पीले) होते जा रहे हो ॥ ११ ॥ गुणवान् विगुणानन्यान् नूनं पश्यसि सत्कृतान् । प्राज्ञोऽप्राज्ञान् विनीतात्मा तेनासि हरिणः कृशः ॥ १२ ॥ तुम गुणवान्, विद्वान् एवं विनीत होनेपर भी सम्मान नहीं पाते और गुणहीन तथा मूढ़ व्यक्तियोंको सम्मानित होते देखते हो; इसीलिये तुम्हारे शरीरका रंग फीका पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो ॥ १२ ॥ अवृत्त्या क्लिश्यमानोऽपि वृत्त्युपायान् विगर्हयन् । माहात्म्याद् व्यथसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ १३ ॥ जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेसे तुम क्लेश उठाते होगे, किंतु अपने गौरवके कारण जीविकाके प्रतिग्रह आदि उपायोंकी निन्दा करते हुए उन्हें स्वीकार नहीं करते होगे। यही तुम्हारी उदासी और दुर्बलताका कारण है ॥ १३ ॥ सम्पीड्यात्मानमार्यत्वात् त्वया कश्चिदुपस्कृतः । जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिणः कृशः ॥ १४ ॥ साधो! तुम सज्जनताके कारण अपने शरीरको कष्ट देकर भी जब किसीका उपकार करते हो; तब वह तुम्हें अपनी शक्तिसे पराजित समझता है; इसीलिये तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो ॥ १४ ॥ क्लिश्यमानान् विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मनः । मन्ये त्वं ध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ १५ ॥ जिनका चित्त काम और क्रोधसे आक्रान्त है, अतएव जो कुमार्गपर चलकर कष्ट भोग रहे हैं। सम्भवतः ऐसे ही लोगोंके लिये तुम सदा चिन्तित रहते हो; इसीलिये दुर्बल होकर सफेद (पीले) पड़ते जा रहे हो ॥ १५ ॥ प्रज्ञासम्भावितो नूनमप्रज्ञैरुपसंहितः । हीयमानोऽसि दुर्वृत्तैस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ १६ ॥ यद्यपि तुम अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा सम्मानके योग्य हो तो भी अज्ञानी पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं और दुराचारी मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार करते हैं। इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर सूखकर पीला पड़ता जा रहा है ॥ १६ ॥
नूनं मित्रमुखः शत्रुः कश्चिदार्यवदाचरन् । वञ्चयित्वा गतस्त्वां वै तेनासि हरिणः कृशः ॥ १७ ॥ निश्चय ही कोई शत्रु मुँहसे मित्रताकी बातें करता हुआ आया, श्रेष्ठ पुरुषके समान बर्ताव करने लगा और तुम्हें ठगकर चला गया; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो ॥ १७ ॥
प्रकाशार्थगतिर्नूनं रहस्यकुशलः कृती । तज्ज्ञैर्न पूज्यसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ १८ ॥ तुम्हारी अर्थगति—कार्यपद्धति सबको विदित है, तुम रहस्यकी बातें समझानेमें कुशल और विद्वान् हो तो भी गुणज्ञ पुरुष तुम्हारा आदर नहीं करते हैं; इसीसे तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ॥ १८ ॥
असत्स्वपि निविष्टेषु ब्रुवतो मुक्तसंशयम् । गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ १९ ॥ तुम दुराग्रही दुष्ट पुरुषोंके बीचमें ही संशयरहित होकर उत्तम बात कहते हो, तो भी तुम्हारे गुण वहाँ प्रकाशित नहीं होते; इसीलिये तुम दुर्बल होते और फीके पड़ते जा रहे हो ॥ १९ ॥
धनबुद्धिश्रुतैर्हीनः केवलं तेजसान्वितः । महत् प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २० ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्यासे हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसीलिये तुम पाण्डुवर्णके हो गये हो और तुम्हारा शरीर भी सूखता जा रहा है ॥ २० ॥
तपःप्रणिहितात्मानं मन्ये त्वारण्यकाङ्क्षिणम् । बान्धवा नाभिनन्दन्ति तेनासि हरिणः कृशः ॥ २१ ॥ मुझे यह भी जान पड़ता है कि तुम्हारा मन तपस्यामें लगा है और इसलिये तुम जंगलमें रहना चाहते हो, परंतु तुम्हारे भाई-बन्धु इस बातको पसंद नहीं करते हैं; इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो गये हो ॥ २१ ॥
(सुदुर्विनीतः पुत्रो वा जामाता वा प्रमार्जकः । दारा वा प्रतिकूलास्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ अथवा यह भी सम्भव है कि तुम्हारा पुत्र दुर्विनीत—उद्दण्ड हो, या दामाद घरकी सारी सम्पत्ति झाड़-पोंछकर ले जानेवाला हो या तुम्हारी पत्नी प्रतिकूल स्वभावकी हो; इसीसे तुम कृशकाय और पीले होते जा रहे हो ।।
भ्रातरोऽतीव विषमाः पिता वा क्षुत्क्षतो मृतः । माता ज्येष्ठो गुरुर्वापि तेनासि हरिणः कृशः ॥
तुम्हारे भाई बड़े बेईमान हों अथवा तुम्हारे पिता, माता या ज्येष्ठ भाई एवं गुरुजन भूखसे दुर्बल होकर मर गये हों, इस बातकी भी सम्भावना है। शायद इसीसे तुम्हारे शरीरका रंग सफेद हो गया है और तुम सूखते चले जा रहे हो ॥
ब्राह्मणो वा हतो गौर्वा ब्रह्मस्वं वा हृतं पुरा ।
देवस्वं वाधिकं काले तेनासि हरिणः कृशः ॥
अथवा यह भी अनुमान होता है कि पहले तुमने किसी ब्राह्मण या गौकी हत्या की हो, किसी ब्राह्मण या देवताका किसी समय अधिक-से-अधिक धन चुरा लिया हो, इसीलिये तुम कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥
हृतदारोऽथ वृद्धो वा लोके द्विष्टोऽथ वा नरैः ।
अविज्ञानेन वा वृद्धस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्रीका किसीने अपहरण कर लिया हो। अथवा तुम बूढ़े हो चले हो या जगत्के मनुष्य तुमसे द्वेष करने लगे हों। अथवा अज्ञानके द्वारा ही तुम बढ़े-चढ़े हो और इसीलिये चिन्ताके कारण तुम्हारा शरीर सफेद तथा दुर्बल हो गया हो ॥
वार्धक्यार्थं धनं दृष्ट्वा स्वां श्रीर्वापि परैर्हृता ।
वृत्तिर्वा दुर्जनापेक्षा तेनासि हरिणः कृशः ॥)
बुढ़ापेके लिये तुम्हारे पास धनका संग्रह देखकर दूसरोंने तुम्हारी उस निजी सम्पत्तिका अपहरण कर लिया हो अथवा जीविकाके लिये दुष्ट पुरुषोंकी अपेक्षा रखनी पड़ती हो, इसकी भी सम्भावना जान पड़ती है। शायद इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर दुबला होता और पीला पड़ता जा रहा हो ॥
इष्टभार्यस्य ते नूनं प्रातिवेश्यो महाधनः ।
युवा सुललितः कामी तेनासि हरिणः कृशः ॥ २२ ॥
यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्री परम सुन्दरी होनेके कारण तुम्हें बहुत प्रिय हो और तुम्हारे पड़ोसमें ही कोई बहुत सुन्दर, महाधनी और कामी नवयुवक निवास करता हो! इसी चिन्तासे तुम दुबले और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २२ ॥
नूनमर्थवतां मध्ये तव वाक्यमनुत्तमम् ।
न भाति कालेऽभिहितं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २३ ॥
निश्चय ही तुम धनवानोंके बीच परम उत्तम और समयोचित बात कहते होगे, किंतु वह उन्हें पसंद न आती होगी। इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ॥
दृढपूर्वं श्रुतं मूर्खं कुपितं हृदयप्रियम् ।
अनुनेतुं न शक्नोषि तेनासि हरिणः कृशः ॥ २४ ॥
तुम्हारा कोई पहलेका दृढ़ निश्चयवाला प्रिय व्यक्ति मूर्खताके कारण तुमपर कुपित हो गया होगा और तुम उसे किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त नहीं कर पाते होगे। इसीलिये तुम दुर्बल और फीके पड़ते जा रहे हो ॥ २४ ॥
नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते । कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २५ ॥ निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत (पीत) वर्णके और दुबले हो रहे हो ॥ २५ ॥
नूनं त्वां सुगुणैर्युक्तं पूजयानं सुहृद्ध्रुवम् । ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ अवश्य ही तुम सद्गुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है। इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो ॥ २६ ॥
अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया । विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिणः कृशः ॥ २७ ॥ निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २७ ॥
नानाबुद्धिरुचो लोके मनुष्यान् नूनमिच्छसि । ग्रहीतुं स्वगुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ २८ ॥ निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो। इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो ॥ २८ ॥
अविद्वान् भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् । यशः प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २९ ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो। इसीलिये कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥ २९ ॥
चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते । कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३० ॥ तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये। इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो ॥ ३० ॥
नूनमात्मकृतं दोषमपश्यन् किंचिदात्मनः । अकारणेऽभिशप्तोऽसि तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३१ ॥
एक बात यह भी ध्यानमें आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखायी नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं। शायद इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३१ ॥
साधून् गृहस्थान् दृष्ट्वा च तथा साधून् वनेचरान् ।
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३२ ॥
तुम विरक्त साधुओंको गृहस्थ, दुर्जनोंको वनवासी तथा संन्यासियोंको मठ-मन्दिरमें आसक्त देखते हो; इसीलिये सफेद और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३२ ॥
सुहृदां दुःखमार्तानां न प्रमोक्ष्यसि चार्तिजम् ।
अलमर्थगुणैर्हीनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३३ ॥
तुम्हारे स्नेही बन्धु-बान्धव रोग आदिसे पीड़ित होकर महान् दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ाजनित कष्टसे मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी तुम अर्थ-लाभसे हीन पाते हो; शायद इसीलिये तुम सफेद और दुबले-पतले हो गये हो ॥ ३३ ॥
धर्म्ममर्थ्यं च काम्यं च काले चाभिहितं वचः ।
न प्रतीयन्ति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३४ ॥
तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं। इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो ॥ ३४ ॥
दत्तानकुशलैरर्थान् मनीषी संजिजीविषुः ।
प्राप्य वर्तयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३५ ॥
मनीषी होनेपर भी तुम जीवन-निर्वाहकी इच्छासे ही अज्ञानी पुरुषोंके दिये हुए धनको लेकर उसीपर गुजारा करते हो; इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो ॥ ३५ ॥
पापात् प्रवर्धतो दृष्ट्वा कल्याणानावसीदतः ।
ध्रुवं गर्हयसे नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३६ ॥
पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोंमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो ॥ ३६ ॥
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि ।
सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३७ ॥
एक दूसरेसे विरोध रखनेवाले अपने सुहृदोंको रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो ॥ ३७ ॥
श्रोत्रियांश्च विकर्मस्थान् प्राज्ञांश्चाप्यजितेन्द्रियान् ।
मन्येऽनुध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३८ ॥