महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1066, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़े-बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है ।। १२-१३ ।। ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति । श्रुत्वा च फलमाचष्टे स्वयं नारायणः प्रभुः ।। १४ ।। जो मनुष्य उस शास्त्रको सदा पढ़ते हैं, जिन्हें उसका तत्त्व हृदयंगम हो जाता है तथा जो उसका फल सुनकर दूसरोंके सामने व्याख्या करते हैं, वे साक्षात् भगवान् नारायणस्वरूप हो जाते हैं ।। १४ ।। गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम् । एतत् फलमवाप्नोति यो नरोऽतिथिपूजकः ।। १५ ।। जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है ।। १५ ।। श्रोतारः श्रद्धानाश्च येषां शुद्धं च मानसम् । तेषां व्यक्तं जिता लोकाः श्रद्दधानेन साधुना ।। १६ ।। जो श्रद्धापूर्वक धर्मशास्त्रका श्रवण करते हैं तथा जिनका हृदय शुद्ध हो गया है, वे श्रद्धालु एवं श्रेष्ठ मनके द्वारा अवश्य ही पुण्यलोकपर विजय प्राप्त कर लेते हैं ।। १६ ।। मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते । धर्मं च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नरः ।। १७ ।। शुद्धचित्त पुरुष श्रद्धापूर्वक शास्त्र-श्रवण करनेसे पूर्व पापसे मुक्त हो जाता है तथा वह भविष्यमें भी पापसे लिप्त नहीं होता है। नित्य-प्रति धर्मका अनुष्ठान करता है और मरनेके बाद उसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।। १७ ।। कस्यचित् त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया । स्थितो ह्यन्तर्हितो भूत्वा पर्यभाषत वासवम् ।। १८ ।। एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात् पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा— ।। १८ ।। यौ तौ कामगुणोपेतावश्विनौ भिषजां वरौ । आज्ञयाहं तयोः प्राप्तः सनरान् पितृदैवतान् ।। १९ ।। 'वे जो कमनीय गुणोंसे सम्पन्न वैद्यप्रवर अश्विनीकुमार हैं, उन दोनोंकी आज्ञासे मैं यहाँ देवताओं, पितरों और मनुष्योंके पास आया हूँ ।। १९ ।। कस्माद्धि मैथुनं श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् । किमर्थं च त्रयः पिण्डाः प्रविभक्ताः पृथक् पृथक् ।। २० ।। 'मेरे मनमें यह जिज्ञासा हुई है कि श्राद्धके दिन श्राद्ध-कर्ता और श्राद्धान्न भोजन करनेवाले ब्राह्मणके लिये जो मैथुनका निषेध किया गया है, उसका क्या कारण है? तथा श्राद्धमें पृथक्-पृथक् तीन पिण्ड किसलिये दिये जाते हैं? ।। २० ।।