भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1067, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1067

प्रथमः कस्य दातव्यो मध्यमः क्व च गच्छति । उत्तरश्च स्मृतः कस्य एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥ ‘प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ श्रद्दधानेन दूतेन भाषितं धर्मसंहितम् । पूर्वस्थास्त्रिदशाः सर्वे पितरः पूज्य खेचरम् ॥ २२ ॥ उस श्रद्धालु देवदूतके इस प्रकार धर्मयुक्त भाषण करनेपर पूर्वदिशामें स्थित हुए सभी देवताओं और पितरोंने उस आकाशचारी पुरुषकी प्रशंसा करते हुए कहा ॥ २२ ॥

पितर ऊचुः स्वागतं तेऽस्तु भद्रं ते श्रूयतां खेचरोत्तम । गूढार्थः परमः प्रश्नो भवता समुदीरितः ॥ २३ ॥ **पितर बोले—**आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! तुम्हारा स्वागत है। तुम कल्याणके भागी होओ। तुमने गूढ़ अभिप्रायसे युक्त बहुत उत्तम प्रश्न उपस्थित किया है। इसका उत्तर सुनो ॥ २३ ॥ श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं व्रजेत् ।