महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1069, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्र यस्त्वन्तिमः पिण्डो गच्छते जातवेदसम् ॥ ३१ ॥ भवते का गतिस्तस्य कं वा समनुगच्छति । तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है? ॥ ३१ ½ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गतिः ॥ ३२ ॥ फलं वृत्तिं च मार्गं च यश्चैनं प्रतिपद्यते । यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये ॥ ३२ ½ ॥
पितर ऊचुः
सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरितः ॥ ३३ ॥ रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टाः स्म गगनेचर । एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्च मुनयस्तथा ॥ ३४ ॥ पितरोंने कहा—आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान् प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ तेऽप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् । वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम् ॥ ३५ ॥ पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशाः । परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं। जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है, उन सर्वश्रेष्ठ चिरजीवी महात्मा मार्कण्डेयको छोड़कर और किसीको उसका पता नहीं है ॥ ३५ ½ ॥ त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम् ॥ ३६ ॥ देवदूतेन यः पृष्टः श्राद्धस्य विधिनिश्चयः । गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम ॥ ३७ ॥ उन्होंने भगवान् विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है। देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है। सावधान होकर मुझसे सुनो ॥ ३६-३७ ॥ अपो गच्छति यो ह्यत्र शशिनं ह्येष प्रीणयेत् । शशी प्रीणयते देवान् पितॄंश्चैव महामते ॥ ३८ ॥ महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ॥ भुङ्क्ते तु पत्नी यं चैषामनुज्ञाता तु मध्यमम् ।