भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1070, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1070

पुत्रकामाय पुत्रं तु प्रयच्छन्ति पितामहाः ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार श्राद्धकर्ताकी पत्नी गुरुजनोंकी आज्ञासे जो मध्यम पिण्डका भक्षण करती है, उससे प्रसन्न हुए पितामह पुत्रकी कामनावाले पुरुषको पुत्र प्रदान करते हैं ॥ ३९ ॥ हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे । पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीताः कामान् दिशन्ति च ॥ ४० ॥ अग्निमें जो पिण्ड डाला जाता है, उसके विषयमें भी मुझसे समझ लो। उससे पितर तृप्त होते हैं और तृप्त होकर वे मनुष्यकी सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ४० ॥ एतत् ते कथितं सर्वं त्रिषु पिण्डेषु या गतिः । ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति ॥ ४१ ॥ तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्यं हि मैथुनम् । शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम ॥ ४२ ॥ इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया। श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अतः उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मणको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये ॥ ४१-४२ ॥ ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा । तस्मात् स्नातः शुचिः क्षान्तः श्राद्धं भुञ्जीत वै द्विजः ॥ ४३ ॥ मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ॥ प्रजा विवर्धते चास्य यश्चैवं सम्प्रयच्छति । ततो विद्युत्प्रभो नाम ऋषिराह महातपाः ॥ ४४ ॥ जो इस प्रकार श्राद्धका दान देता है, उसकी संतति बढ़ती है। पितरोंके इस प्रकार कहनेके बाद विद्युत्प्रभ नामवाले एक महातपस्वी महर्षिने अपना प्रश्न उपस्थित किया ॥ ४४ ॥ आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूपं प्रकाशते । स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत् ॥ ४५ ॥ उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा- ॥ तिर्यग्योनिगतान् सत्त्वान् मर्त्या हिंसन्ति मोहिताः । कीटान् पिपीलिकान् सर्पान् मेषान् समृगपक्षिणः ॥ ४६ ॥ किल्बिषं सुबहु प्राप्ताः किंस्विदेषां प्रतिक्रिया ।