भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1071, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1071

‘देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे-चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे बहुत-सा पाप बटोर लेते हैं। उनके लिये इन पापोंसे छूटनेका क्या उपाय है?’ ।। ४६ १/२ ।।
ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ।। ४७ ।।
पितरश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म तं मुनिम् ।
उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। ४७ १/२ ।।

शक्र उवाच

कुरुक्षेत्रं गयां गङ्गां प्रभासं पुष्कराणि च ।। ४८ ।।
एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम् ।
तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ।। ४९ ।।
इन्द्र बोले— मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे। ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ।।
त्र्यहं स्नातः स भवति निराहारश्च वर्तते ।
स्पृशते यो गवां पृष्ठं बालधिं च नमस्यति ।। ५० ।।
जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोंमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ।।
ततो विद्युत्प्रभो वाक्यमभ्यभाषत वासवम् ।
अयं सूक्ष्मपरो धर्मस्तं निबोध शतक्रतो ।। ५१ ।।
तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा—‘शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।
घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्तः प्रियंगुणा ।
क्षीरेण षष्टिकान् भुक्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ५२ ।।
‘बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
श्रूयतां चापरं गुह्यं रहस्यमृषिचिन्तितम् ।
श्रुतं मे भाषमाणस्य स्थाणोः स्थाने बृहस्पतेः ।। ५३ ।।
रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते ।
‘एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये। इसे मैंने भगवान् शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान् रुद्रके साथ ही सुना था। देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।