भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1072, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1072

पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम् ॥ ५४ ॥ निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताञ्जलिः । तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत् ॥ ५५ ॥ ‘जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदेवकी ओर देखता है, वह महान् तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है’ ॥ ५४-५५ ॥

रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति । ग्रीष्मकालेऽथ वा शीते एवं पापमपोहति ॥ ५६ ॥ ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती । तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुनः ॥ ५७ ॥ ‘जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है। इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है। वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है’ ॥ ५६-५७ ॥

मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराजः शतक्रतुः । उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम् ॥ ५८ ॥ तत्पश्चात् देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा— ॥

धर्मगुह्यं तु भगवन् मानुषाणां सुखावहम् । सरहस्यांश्च ये दोषास्तान् यथावदुदीरय ॥ ५९ ॥ ‘भगवन्! मनुष्योंको सुख देनेवाले धर्मके गूढ़-स्वरूपका तथा रहस्योंसहित जो दोष हैं, उनका भी यथावत्रूपसे वर्णन कीजिये’ ॥ ५९ ॥

बृहस्पतिरुवाच

प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये । हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्वति ॥ ६० ॥ बालवत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् । तेषां दोषान् प्रवक्ष्यामि तान् निबोध शचीपते ॥ ६१ ॥ बृहस्पतिजीने कहा—शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो ।।

भानुमाननिलश्चैव हव्यवाहश्च वासव ।