भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1073, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1073

लोकानां मातरश्चैव गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥ ६२ ॥ वासव! साक्षात् ब्रह्माजीने सूर्य, वायु, अग्नि तथा लोकमाता गौओंकी सृष्टि की है ॥ ६२ ॥ लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येष्वेतेषु देवताः । सर्वे भवन्तः शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम् ॥ ६३ ॥ ये मर्त्यलोकके देवता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्‌का उद्धार करनेकी शक्ति रखते हैं। आप सब लोग सुनें, मैं एक-एक धर्मका निश्चय बता रहा हूँ ॥ ६३ ॥ वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वृत्ताः कुलपांसनाः । स्त्रियः सर्वाश्च दुर्वृत्ताः प्रतिमेहन्ति या रविम् ॥ ६४ ॥ अनिलद्वेषिणः शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोंतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है ॥ ६४ १/२ ॥ हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिधं ये न जुह्वति ॥ ६५ ॥ अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावकः । जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते, उनके अग्निहोत्रमें अग्निदेव हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं (अतः अग्नि प्रज्वलित किये बिना उसे आहुति नहीं देनी चाहिये) ॥ ६५ १/२ ॥ क्षीरं तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवाः ॥ ६६ ॥ न तेषां क्षीरपाः केचिज्जायन्ते कुलवर्धनाः । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च ॥ ६७ ॥ जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं। उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है ॥ ६६-६७ ॥ एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्विजातिभिः । तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्यं कार्यं च नित्यशः ॥ ६८ ॥ भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अतः अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोंको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये। यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ६८ १/२ ॥ ततः सर्वा महाभाग देवताः समरुद्गणाः ॥ ६९ ॥ ऋषयश्च महाभागाः पृच्छन्ति स्म पितृंस्ततः ।