भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1074, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1074

तब मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा— ।। ६९ १/२ ।।
पितरः केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम् ।। ७० ।।
अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवोर्ध्वदैहिकम् ।
आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयुः केन कर्मणा ।। ७१ ।।
एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि नः ।
‘मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन-सा कर्म करें, जिससे आप सम्पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्ट होंगे? श्राद्धमें दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्य किस कर्मसे किस प्रकार पितरोंके ऋणसे छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं। यह सब सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है’ ।। ७०-७१ १/२ ।।

पितर ऊचुः
न्यायतो वै महाभागाः संशयः समुदाहृतः ।। ७२ ।।
श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्याना साधुकर्मणाम् ।
पितरोंने कहा—महाभाग देवताओ! आपने न्यायतः अपना संदेह उपस्थित किया है। उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये ।। ७२ १/२ ।।'
नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकैः ।। ७३ ।।
वर्षासु दीपकैश्चैव पितॄणामनृणो भवेत् ।
नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे और वर्षा-ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ।।
अक्षयं निर्व्यलीकं च दानमेतन्महाफलम् ।। ७४ ।।
अस्माकं परितोषश्च अक्षयः परिकीर्त्यते ।
इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान् फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है—ऐसा शास्त्रका कथन है ।।
श्रद्दधानाश्च ये मर्त्या आहरिष्यन्ति संततिम् ।। ७५ ।।
दुर्गात् ते तारयिष्यन्ति नरकात् प्रपितामहान् ।
जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ।।
पितॄणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोमा तपोधनः ।। ७६ ।।
वृद्धगार्ग्यो महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् ।
पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा— ।। ७६ १/२ ।।
के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधनाः ।। ७७ ।।

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