भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1075, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1075

वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः । 'तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं?" ।। ७७१/२ ।।

पितर ऊचुः

नीलषण्डस्य लाङ्गूलं तोयमभ्युद्धरेद् यदि ।। ७८ ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः । **पितरोंने कहा—**मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोंतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ।।

यस्तु शृङ्गगतं पङ्कं कूलादुद्धृत्य तिष्ठति ।। ७९ ।। पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् । जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं ।। ७९१/२ ।।

वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छोभते नरः ।। ८० ।। तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं यः प्रयच्छति । वर्षा-ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं ।। ८०१/२ ।।

अमावास्यां तु ये मर्त्याः प्रयच्छन्ति तिलोदकम् ।। ८१ ।। पात्रमौदुम्बरं गृह्य मधुमिश्रं तपोधन । कृतं भवति तैः श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत् ।। ८२ ।। तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है ।। ८१-८२ ।।

हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा । कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् । श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात् पितृणामनृणो भवेत् ।। ८३ ।। उनकी प्रजा सदा हृष्ट-पुष्ट मनवाली होती है। कुल और वंश-परम्पराकी वृद्धि श्राद्धका फल है। पिण्डदान करनेवालेको यह फल सुलभ होता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, वह उनके ऋणसे छुटकारा पा जाता है ।। ८३ ।।

एवमेव समुद्दिष्टः श्राद्धकालक्रमस्तथा । विधिः पात्रं फलं चैव यथावदनुकीर्तितम् ।। ८४ ।।