भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1077, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1077

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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन

भीष्म उवाच

केन ते च भवेत् प्रीतिः कथं तुष्टिं तु गच्छसि ।
इति पृष्टः सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरीश्वरः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने भगवान् विष्णुसे पूछा—'भगवन्! आप किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं? किस प्रकार आपको संतुष्ट किया जा सकता है?' सुरेन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर जगदीश्वर श्रीहरिने कहा ॥ १ ॥

विष्णुरुवाच

ब्राह्मणानां परीवादो मम विद्वेषणं महत् ।
ब्राह्मणैः पूजितैर्नित्यं पूजितोऽहं न संशयः ॥ २ ॥

भगवान् विष्णु बोले—इन्द्र! ब्राह्मणोंकी निन्दा करना मेरे साथ महान् द्वेष करनेके समान है तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सदा मेरी भी पूजा हो जाती हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

नित्याभिवाद्या विप्रेन्द्रा भुक्त्वा पादौ तथात्मनः ।
तेषां तुष्यामि मर्त्यानां यश्चक्रे च बलिं हरेत् ॥ ३ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये। भोजनके पश्चात् अपने दोनों पैरोंकी भी सेवा करे अर्थात् पैरोंको भलीभाँति धो ले तथा तीर्थकी मृत्तिकासे सुदर्शन चक्र बनाकर उसपर मेरी पूजा करे और नाना प्रकारकी भेंट चढ़ावे। जो ऐसा करते हैं, उन मनुष्योंपर मैं सन्तुष्ट होता हूँ ॥ ३ ॥

वामनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा वराहं च जलोत्थितम् ।
उद्धृतां धरणीं चैव मूर्ध्ना धारयते तु यः ॥ ४ ॥
न तेषामशुभं किंचित् कल्मषं चोपपद्यते ।

जो मनुष्य बौने ब्राह्मण और पानीसे निकले हुए वराहको देखकर नमस्कार करता और उनकी उठायी मृत्तिकाको मस्तकसे लगाता है, ऐसे लोगोंको कभी कोई अशुभ या पाप नहीं प्राप्त होता ॥ ४ ½ ॥

अश्वत्थं रोचनां गां च पूजयेद् यो नरः सदा ॥ ५ ॥
पूजितं च जगत् तेन सदेवासुरमानुषम् ।