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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1078, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1078

जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष, गोरोचना और गौकी सदा पूजा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्की पूजा हो जाती है ।। ५ १/२ ।।
तेन रूपेण तेषां च पूजां गृह्णामि तत्त्वतः ।। ६ ।।
पूजा ममैषा नास्त्यन्या यावल्लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
उस रूपमें उनके द्वारा की हुई पूजाको मैं यथार्थरूपसे अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ। जबतक ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, तबतक यह पूजा ही मेरी पूजा है। इससे भिन्न दूसरे प्रकारकी पूजा मेरी पूजा नहीं है ।। ६ १/२ ।।
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः पूजयन्त्यल्पबुद्धयः ।। ७ ।।
नाहं तत् प्रतिगृह्णामि न सा तुष्टिकरी मम ।। ८ ।।
अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं। मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ। वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं ।। ७-८ ।।

इन्द्र उवाच
चक्रं पादौ वराहं च ब्राह्मणं चापि वामनम् ।
उद्धृतां धरणीं चैव किमर्थं त्वं प्रशंससि ।। ९ ।।
इन्द्रने पूछा—भगवन्! आप चक्र, दोनों पैर, बौने ब्राह्मण, वराह और उनके द्वारा उठायी हुई मिट्टीकी प्रशंसा किसलिये करते हैं? ।। ९ ।।
भवान् सृजति भूतानि भवान् संहरति प्रजाः ।
प्रकृतिः सर्वभूतानां समर्त्यानां सनातनी ।। १० ।।
आप ही प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, आप ही समस्त प्रजाका संहार करते हैं और आप ही मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी सनातन प्रकृति (मूल कारण) हैं ।।

भीष्म उवाच
सम्प्रहस्य ततो विष्णुरिदं वचनमब्रवीत् ।
चक्रेण निहता दैत्याः पद्भ्यां क्रान्ता वसुन्धरा ।। ११ ।।
वाराहं रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपातितः ।
वामनं रूपमास्थाय जितो राजा मया बलिः ।। १२ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तब भगवान् विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा—‘देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है। दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है। वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है ।। ११-१२ ।।
परितुष्टो भवाम्येवं मानुषाणां महात्मनाम् ।
तन्मां ये पूजयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ।। १३ ।।

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