महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानागुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् । सिद्धचारणसंयुक्तं रम्यं पुष्पितकाननम् ॥ ७ ॥ नाना प्रकारकी लता-बेलें वहाँ छायी हुई हैं। मृग और पक्षी उस आश्रमका सेवन करते हैं। सिद्ध और चारण वहाँ सदा निवास करते हैं। उस रमणीय आश्रमके आस-पासका वन सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित है ॥ ७ ॥
व्रतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपसेवितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः ॥ ८ ॥ बहुत-से व्रतपरायण तपस्वी उस आश्रमका सेवन करते हैं। कितने ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी महाभाग ब्राह्मण वहाँ भरे रहते हैं ॥ ८ ॥
नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः । दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! नियम और व्रतसे सम्पन्न, तपस्वी, दीक्षित, मिताहारी और जितात्मा मुनियोंसे वह आश्रम भरा रहता है ॥ ९ ॥
तपोऽध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ । वालखिल्यैश्च बहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ॥ १० ॥ भरतभूषण! वहाँ सब ओर वेदाध्ययनकी ध्वनि गूँजती रहती है। बहुत-से वालखिल्य एवं संन्यासी उस आश्रमका सेवन करते हैं ॥ १० ॥
तत्र कश्चित् समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वितः । आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ॥ ११ ॥ उसी आश्रममें कोई दयालु शूद्र बड़ा उत्साह करके आया। वहाँ रहनेवाले तपस्वी ऋषियोंने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ ११ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान् देवकल्पान् महौजसः । विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्यत भारत ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! उस आश्रमके महातेजस्वी देवोपम मुनियोंको नाना प्रकारकी दीक्षा धारण किये देख उस शूद्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥
अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ । ततोऽब्रवीत् कुलपतिं पादौ संगृह्य भारत ॥ १३ ॥ भारत! भरतभूषण! उसके मनमें वहाँ तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ; अतः उसने कुलपतिके पैर पकड़कर कहा— ॥ १३ ॥
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं वक्तुं द्विजर्षभ । तन्मां त्वं भगवन् वक्तुं प्रव्राजयितुमर्हसि ॥ १४ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी कृपासे धर्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः भगवन्! आप मुझे विधिवत् संन्यासीकी दीक्षा दे दें’ ॥ १४ ॥