भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 109

वर्णावरोऽहं भगवन् शूद्रो जात्यास्मि सत्तम ।
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे ॥ १५ ॥
‘भगवन्! साधुशिरोमणे! मैं वर्णोंमें सबसे छोटा शूद्र जातिका हूँ और यहीं रहकर संतोंकी सेवा करना चाहता हूँ; अतः मुझ शरणागतपर आप प्रसन्न हों’ ॥ १५ ॥

कुलपतिरुवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् ।
आस्यतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ॥ १६ ॥
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशयः ॥ १७ ॥
कुलपतिने कहा—इस आश्रममें कोई शूद्र संन्यासका चिह्न धारण करके नहीं रह सकता। यदि तुम्हारा विचार यहाँ रहनेका हो तो यों ही रहो और साधु-महात्माओंकी सेवा करो। सेवासे ही तुम उत्तम लोक प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥

भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप ।
कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरेश्वर! मुनिके ऐसा कहनेपर शूद्रने सोचा, यहाँ मुझे क्या करना चाहिये? मेरी श्रद्धा तो संन्यास-धर्मके अनुष्ठानके लिये ही है ॥ १८ ॥

विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मनः ।
गत्वाऽऽश्रमपदाद् दूरमुटजं कृतवांस्तु सः ॥ १९ ॥
अच्छा, एक बात समझमें आयी। शूद्रके लिये ऐसा ही विधान हो तो रहे। मैं तो वही करूँगा जो मुझे प्रिय लगता है—ऐसा विचारकर उसने उस आश्रमसे दूर जाकर एक पर्णकुटी बना ली ॥ १९ ॥

तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च ।
निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थोऽभवन्मुनिः ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ यज्ञके लिये वेदी, रहनेके लिये स्थान और देवालय बनाकर मुनिकी भाँति नियमपूर्वक रहने लगा ॥ २० ॥

अभिषेकांश्च नियमान् देवतायतनेषु च ।
बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत् ॥ २१ ॥
वह तीनों समय नहाता, नियमोंका पालन करता, देव-स्थानोंमें पूजा चढ़ाता, अग्निमें आहुति देता और देवताकी पूजा करता था ॥ २१ ॥

संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेन्द्रियः ।
नित्यं संनिहिताभिस्तु ओषधीभिः फलैस्तथा ॥ २२ ॥
अतिथीन् पूजयामास यथावत् समुपागतान् ।