महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1096, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति ॥ ७ ॥ जो मनुष्य बारह वर्षोंतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ॥ ६-७ ॥ श्रूयतां चापरो धर्मो मनुष्याणां सुखावहः । श्रद्दधानेन कर्तव्यः सरहस्यो महाफलः ॥ ८ ॥ अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान् फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये ॥ ८ ॥ कल्यमुत्थाय गोमध्ये गृह्य दर्भान् सहोदकान् । निषिञ्चेत गवां शृङ्गे मस्तकेन च तज्जलम् ॥ ९ ॥ प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य धर्मफलं शृणु । सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है, उसे सुनो ॥ ९१/२ ॥ श्रूयन्ते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु कानिचित् ॥ १० ॥ सिद्धचारणजुष्टानि सेवितानि महर्षिभिः । अभिषेकः समस्तेषां गवां शृङ्गोदकस्य च ॥ ११ ॥ तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है ॥ १०-११ ॥ साधु साध्विति चोद्दिष्टं देवतैः पितृभिस्तथा । भूतैश्चैव सुसंहृष्टैः पूजिता साप्यरुन्धती ॥ १२ ॥ यह सुनकर देवता, पितर और समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने उन्हें साधुवाद दिया और अरुन्धती देवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १२ ॥
पितामह उवाच
अहो धर्मो महाभागे सरहस्य उदाहृतः । वरं ददामि ते धन्ये तपस्ते वर्धतां सदा ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— महाभागे! तुम धन्य हो, तुमने रहस्यसहित अद्भुत धर्मका वर्णन किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हारी तपस्या सदा बढ़ती रहे ॥ १३ ॥
यम उवाच
रमणीया कथा दिव्या युष्मत्तो या मया श्रुता ।